रविवार, 14 जून 2015

मालिनि
---------- 
तरह - तरह के फूल बेचती ,मैं मालिनि अलबेलली।
गेंदा, गुड़हल ,बेला ,जूही , चम्पा और चमेली ।
रंग देख कोई तेता है , कोई गन्ध नशीला ।
कोई दोनों एक फूल में , चाहे छैल छबीला ।
हॅंसी खुशी पूजा गम में भी ,फूल यही भाता है ।
अन्तिम यात्रा के क्रम में भी ,यही फूल जाता है ।
पूरे खिले तो अधखिल भी हैं ,कलियाॅं भी पुरन्यारी ।
गजरे हार सजी लगती हैं ,रूपसियाॅं अतिप्यारी ।
काॅंटों झाड़ों से चुन लाई ,निज हाथों से बाबू ।
ले लो चहो जैसा तुुम भी, यह कुदरत का जादू।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें