बुधवार, 17 जून 2015

मेरे लोग और मैं 
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जब देखता हूॅं लोगों को
घर में और दहलीज के बाहर
देहली तक और
मीडिया के माध्यम से
पूरी दुनियाॅं तक ,
सरल , संयत , संयमी,
सौम्य ,श्रमशीलऔर सदाचारी,
तब बिछ जाना चाहता हूॅं
कदमों में उनके ।
न पाकर इन गुणों को स्वयं में
मेरा मैं
दिखता है मय मात्र,
इतराता फिरता हूॅं जिससे
मैं ,नारद मोह में ।
इन गुणों के अभाव में
मेरे सभी अपने
लगते हैं मरे - से ।
यथार्थबोध के उन क्षणों में
मेरा मान - सम्मान ,
अभिमान और स्वाभिमान
होने लगता है विगलित
सम्पूर्ण रूप में ।
वैसी मनोस्थिति मेंभी
पाताहूॅं आश्वस्त
स्वयं को मैं
कि शेष है विचार बोध
अन्तस् में मेरे अभी
अच्छे -बुरे का ।
फिर लेता हूॅं संकल्प
मन में बार - बार
बन जाने के लिए उन्हीं जैसा
पर यह शुभ विचार
होता रहता है तिरोहित
भोग के धुएॅं में ।
माने बिना हार
नहीं बन्द किया हूॅं सोचना अभी
कि कर सकता हूॅं आत्मसात
इन मानवीय गुणों को
स्वयं में
यदि चाहूॅं तो
क्योंकि हूॅं तो मैंभी
एक अदद आदमी ही
उन्हीं के जैसा ।
रचयिता---- सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञात '

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