बुधवार, 17 जून 2015

रूप सरस पीए जाता हूॅं
नग्न बदन लगता अति सुंदर ।
चित्र उकेरे गजब पुरंदर ।
चोर दृष्टि से बच नजरों से ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं ।।
प्रश्न करे जो,मन का खोटा ।
बेदिल वह दिमाग का मोटा ।
मैं तो कुदरत की सुंदरता ।
अंतरतर में लिए जाता हूॅं ।।
अंग-अंग से प्रेम टपकता ।
दाता का ही भाव झलकता ।
प्रकट लास्य के गीत रसीले ।
सतत सदा गाए जाता हूॅं ।
गंदे मेरे भाव जो माने ।
अपनी राह चलें मन माने ।
बेफिक्री बेलौस बात को ।
निर्भय प्रकट किए जाता हूॅं ।
ईश्वर की रचना न्यारी है ।
ढँको नहीं यह तो प्यारी है ।
इस पर ही अवलंबित रहकर ।
मैं जीवन जीए जाता हूँ ।।

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