बुधवार, 17 जून 2015

बच्चे मन के सच्चे 
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नहीं छिपाते दुर्गुण अपने , 
दुर्गुण अपने नहीं छिपाते ।
पिटते रहते डाॅंटे जाते , 
डाॅंट जाते रोज पिटाते ।
कह जाते हैं गलती अपनी ,
गलती अपनी कहते जाते ।
दुहराते हैं बड़ों की करनी ,
बड़ों की करनी ही दुहराते।
नहीं अलग है बस्ती इनकी ,
बस्ती इनकी अलग नहीं है ।
तुमसे हमसे उनसे सबसे ,
स्रोत ज्ञान का अलग नहीं है ।
बच्चों को हम ही सिखलाते ,
सिखलाते बच्चों को हम ही।
खोना पाना रोना हॅंसना ,
कहना सहना ऐंठ क्रोध भी ।
खेलें खाएॅं पूछ माॅंगकर ,
पूछ माॅंगकर खेलें खाएॅं ।
स्वाभाविक चंचलता पर हम ,
प्यार भुलाकर क्रोध दिखाएॅं ।
इनके मन में भेद नहीं है ,
नहीं भेद है मन में इनके ।
जाति धर्म और ऊॅंच -नीच का
भरें भेद हम मन में इनके ।
खूब कोसते मात - पिता को ,
मात - पिता को खूब कोसते ।
आपस में जब बच्चे सारे
भेद जान भी भेद न पाते ।
अपने ही बच्चें की सोचो ,
सोचो अपने गी बच्चों की ।
जहर न घोलो मन में इनके ,
ऊॅंच नीच और जाति धर्म की ।
आपस में जो मारकाट है ,
मारकाट जो है आपस की ।
रहे झेलते दंश ये बच्चे,
सोच तनिक इनके त्रासद की ।
रचयिता--- सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '

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