विचार , आज का । सादर नमन मित्रों !
इस लोक जीवन में आर्थिक विकास ही वास्तविक विकास है ।इसीलिए भोजपुी में कहा जाता है --- " दरबे से सरबे , चहबे सो करबे ।" धन सबकुछ तो नहीं , पर बहुत कुछ है । विकासशील से विकसित होते हुए विशालतम विकास प्राप्त करने और उपभोग तक , धन अन्यतम महत्व रखता है ।प्राथमिक , द्वितीयक और तृतीयक क्षैत्रक के विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन धन से और धन के लिए किया जाता है जिससे जीवन स्तर समुन्नत होता है ।
कुटीर और लघु उद्योगों से लगायत भारी उद्योगों तक तथा कृषि से लगायत परमाणु एवं अन्तरिक्ष अनुसन्धान तक , रेलवे सहित परिवहन के अन्य थल - जल - वायु मार्गों से चलते हुए ,हमारा उद्देश्य वस्तुओं के अर्जन और सेवाउत्पाद के बेहतर लक्ष्य को हासिल करना है ।
कृषि उत्पाद न केवल पुष्ट होकर जीने के लिए बल्कि उसी आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बढ़ाया जाता रहा है । इसी तरह प्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक के उद्योग भी हैं ।पानी ,बिजली ,सड़क , परिवहन ,स्वास्थ्य , शिक्षा ,संचार और बैंकिंग आदि ही नहीं अपितु साहित्य ,संगीत , कला विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में विकास भी आर्थिक विकास के ही अन्र्तर्गत है ।अधिकाधिक खनिज सम्पत्ति का उत्पादन और विदेशी मुद्रा का संचयन भी इसी के अन्र्तर्गत आता है । यह अति प्रसन्नता की बात है कि वर्तमान परिदृश्य में विश्व पटल पर चीन देश के बाद हमारे देश भारत का आर्थिक विकास की प्रगतिशसीलता में दूसरा स्थान है ।अर्थशास्त्रियों के अनुसार और प्राप्त आॅंकड़ों के आधार पर यह आकलन किया जा रहा है कि सन् 2020 तकभारत चीन को पीछे छोड़ता हुआ अग्रणी हो जाएगा ।
आर्थिक विकास के महत्व को भर्त्रृहरि शतक के नीतिशतक में इसप्रकार प्रतिपादित किया गया है ---
यस्यास्ति वित्तम् स नर: कुलीन: , स: पण्डित: ,, स: श्रुतवान , गुणज्ञ: ।
स एव वक्ता , स च दर्शनीय: ,, सर्वे गुणा: काञ्चनम् आश्रयन्ति ।।
भर्त्रृहरि शतक के अपने काव्यानुवाद में मैंने धन के महत्व को इसप्रकार रूपायित किया है ----
धनवान ही तो कुलीन है , पण्डित वही विद्वान है ।
दर्शनीय भी है वही ,वक्ता , गुणों का निधान है ।।
जय भारत !
लेखक एवं प्रस्तोता ----- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
इस लोक जीवन में आर्थिक विकास ही वास्तविक विकास है ।इसीलिए भोजपुी में कहा जाता है --- " दरबे से सरबे , चहबे सो करबे ।" धन सबकुछ तो नहीं , पर बहुत कुछ है । विकासशील से विकसित होते हुए विशालतम विकास प्राप्त करने और उपभोग तक , धन अन्यतम महत्व रखता है ।प्राथमिक , द्वितीयक और तृतीयक क्षैत्रक के विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन धन से और धन के लिए किया जाता है जिससे जीवन स्तर समुन्नत होता है ।
कुटीर और लघु उद्योगों से लगायत भारी उद्योगों तक तथा कृषि से लगायत परमाणु एवं अन्तरिक्ष अनुसन्धान तक , रेलवे सहित परिवहन के अन्य थल - जल - वायु मार्गों से चलते हुए ,हमारा उद्देश्य वस्तुओं के अर्जन और सेवाउत्पाद के बेहतर लक्ष्य को हासिल करना है ।
कृषि उत्पाद न केवल पुष्ट होकर जीने के लिए बल्कि उसी आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बढ़ाया जाता रहा है । इसी तरह प्राथमिक क्षेत्रक द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक के उद्योग भी हैं ।पानी ,बिजली ,सड़क , परिवहन ,स्वास्थ्य , शिक्षा ,संचार और बैंकिंग आदि ही नहीं अपितु साहित्य ,संगीत , कला विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में विकास भी आर्थिक विकास के ही अन्र्तर्गत है ।अधिकाधिक खनिज सम्पत्ति का उत्पादन और विदेशी मुद्रा का संचयन भी इसी के अन्र्तर्गत आता है । यह अति प्रसन्नता की बात है कि वर्तमान परिदृश्य में विश्व पटल पर चीन देश के बाद हमारे देश भारत का आर्थिक विकास की प्रगतिशसीलता में दूसरा स्थान है ।अर्थशास्त्रियों के अनुसार और प्राप्त आॅंकड़ों के आधार पर यह आकलन किया जा रहा है कि सन् 2020 तकभारत चीन को पीछे छोड़ता हुआ अग्रणी हो जाएगा ।
आर्थिक विकास के महत्व को भर्त्रृहरि शतक के नीतिशतक में इसप्रकार प्रतिपादित किया गया है ---
यस्यास्ति वित्तम् स नर: कुलीन: , स: पण्डित: ,, स: श्रुतवान , गुणज्ञ: ।
स एव वक्ता , स च दर्शनीय: ,, सर्वे गुणा: काञ्चनम् आश्रयन्ति ।।
भर्त्रृहरि शतक के अपने काव्यानुवाद में मैंने धन के महत्व को इसप्रकार रूपायित किया है ----
धनवान ही तो कुलीन है , पण्डित वही विद्वान है ।
दर्शनीय भी है वही ,वक्ता , गुणों का निधान है ।।
जय भारत !
लेखक एवं प्रस्तोता ----- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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