बुधवार, 17 जून 2015

आकांक्षाओं का विशद अतल
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सोचा था मैंने भी एक दिन ,कुछ मीठे स्वर में गाऊॅंगा ।
संकेत दे रहा समय किन्तु , आवाज मात्र कर पाऊॅंगा ।
निस्सीम निखिल ब्रह्माण्ड बीच , कुछ खोजा पर पाया ही नहीं।
जीवन को ध्वनि मैंने भी दिया , अवलम्ब का सुख जाना ही नहीं ।
गाने का सपना चूर हुआ , ये अधर खुले के खुले रहे ।
शायद अनुभव की जलन रही ,अधराधर तो अनजले रहे ।
सरगोशी ऋतु के हलचल का , यह कण्ठ मेरा तो सह न सका ।
कुछ आह भरी चीखें निकलीं , जीवन का गीत सुना न सका ।
सुगन्ध अमर साॅंसों की मेरी , सम्मोहित तुमको कर पाए ।
है साॅंस मेरी पर गन्ध तेरा , उड़कर तुममें ही मिल जाए ।
ना पहुॅंच सका तट तक तो भी , चीखों को स्वर दे दी तूने ।
तट तक जाने के पूर्व टुटीं , सागर - लहरें उर के गाने ।
सागर उर के सन्तापों को , देखा तूने , आशीष दिया ।
अविरल टुटतीं जुटतीं ही रहीं ,आवाज भी तूने सुन ही लिया।
खामोशी वैसी बनी रही , जो कहना था तुम सुन ही लिए ।
तुम बिन सुनने को कौन वहाॅं , सागर उर में आवाज लिए ।
यात्रा वृत्तान्त सुनाने को ,लहरें तट के समीप जातीं ।
झटके पल- पल सहते - सहते खामोशी में ही मिट जातीं ।
शून्य बने आवाज माप , उन्मत्त प्रेम जब होता है ।
आकांक्षाओं का विशद अतल मापित ध्वनि से ना होता है ।।
रचयिता-------- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
उप मुख्य प्रशासक / अटल कवि परिवार

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