सादर नमस्कार आप सभी मनीषियों को ! प्रस्तुत है एक व्यंग रचना ।कृपया इसका आनन्द लें --------
किसी तरह से काम निकालो , आगे बढ़ जा भाई ।
अगल - बगल की कुछ ना सोचो , करते रहो कमाई ।
काॅंटे सिर्फ राह के अपने , इधर - उधर कर बढ़ जा ।
साधन की परवाह करो ना , ऊॅंचाई पर चढ़ जा ।
सहयोगी जो रहे तुम्हारें , उनको रौंद कुचल दो ।
आलोचक जो ही हैं तेरे , पहले उन्हें कुफल दो ।
तनिक रहे सन्देह किसी पर , फाॅंस कभी बन जाए ।
झट पकड़ो गर्दन उसकी , वह उभर कभी ना पाए ।
आय प्रतिष्ठा पद जुबान , उसकी जल्दी कर बन्द ।
सम्भव हो तो कर समाप्त , गिन -चुन ऐसे जयचन्द ।
जब कुछ कर सकने की क्षमता , नहीं तुम्हारे पास ।
चुगली अस्त्र अमोघ एक है , जबर्दस्त संत्रास ।
करो खुशामद शक्तिमान का परनिन्दा अपनाई ।
पाओ निजउन्नति का लड्डू , दो बैरी भहराई ।
किसी तरह से करो उगाही , धन संचय कर भाय ।
इतना जिससे सात पुश्त भी , बैठ निठल्ले खाय ।।
-------- रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
किसी तरह से काम निकालो , आगे बढ़ जा भाई ।
अगल - बगल की कुछ ना सोचो , करते रहो कमाई ।
काॅंटे सिर्फ राह के अपने , इधर - उधर कर बढ़ जा ।
साधन की परवाह करो ना , ऊॅंचाई पर चढ़ जा ।
सहयोगी जो रहे तुम्हारें , उनको रौंद कुचल दो ।
आलोचक जो ही हैं तेरे , पहले उन्हें कुफल दो ।
तनिक रहे सन्देह किसी पर , फाॅंस कभी बन जाए ।
झट पकड़ो गर्दन उसकी , वह उभर कभी ना पाए ।
आय प्रतिष्ठा पद जुबान , उसकी जल्दी कर बन्द ।
सम्भव हो तो कर समाप्त , गिन -चुन ऐसे जयचन्द ।
जब कुछ कर सकने की क्षमता , नहीं तुम्हारे पास ।
चुगली अस्त्र अमोघ एक है , जबर्दस्त संत्रास ।
करो खुशामद शक्तिमान का परनिन्दा अपनाई ।
पाओ निजउन्नति का लड्डू , दो बैरी भहराई ।
किसी तरह से करो उगाही , धन संचय कर भाय ।
इतना जिससे सात पुश्त भी , बैठ निठल्ले खाय ।।
-------- रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें