चलना हुआ बराबर
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बदला नहीं मैं अब भी,
जमाने गुजर गए हैं ।
शागिर्द थे जो कल तक,
उस्ताद बन गए हैं ।।
गम चाहे जितना दे दे,
बर्दास्त की भी ताकत ।
बरकत दुआ हो तेरी ,
,मेरे लिए सदाकत ।।
जब देखता मुझे वो ,
नीची निगाह उसकी ।
पर देखता उसे मैं ,
ऊॅंचा उसे समझकर ।।
उतर चुका हूॅं गहरे ,
ऊॅंचे उठे वे जितने ।
चलना हुआ बराबर ,
पर फासला बहुुत है ।।
इस फासले को उसने ,
समझा नहीं मुकम्मल ,
मुझमें लखे गिरावट ,
रखता गरूर पल - पल ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
जमाने गुजर गए हैं ।
शागिर्द थे जो कल तक,
उस्ताद बन गए हैं ।।
गम चाहे जितना दे दे,
बर्दास्त की भी ताकत ।
बरकत दुआ हो तेरी ,
,मेरे लिए सदाकत ।।
जब देखता मुझे वो ,
नीची निगाह उसकी ।
पर देखता उसे मैं ,
ऊॅंचा उसे समझकर ।।
उतर चुका हूॅं गहरे ,
ऊॅंचे उठे वे जितने ।
चलना हुआ बराबर ,
पर फासला बहुुत है ।।
इस फासले को उसने ,
समझा नहीं मुकम्मल ,
मुझमें लखे गिरावट ,
रखता गरूर पल - पल ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
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