दूर मन इससे रहो
--------------------
त्रिवली उभरती उदर पर , तटिनी तरंग उछाल ज्यों ।
उरोज युग्म चकोर द्वय , करते उमंग धमाल त्यों ।
मुख कमल सरिता प्रवाहित, निगलने को साशयित ।
तब, दूर मन इससे रहो , भव पार यदि हो आशयित ।।
रचयिता ----कवि सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञातत '
--------------------
त्रिवली उभरती उदर पर , तटिनी तरंग उछाल ज्यों ।
उरोज युग्म चकोर द्वय , करते उमंग धमाल त्यों ।
मुख कमल सरिता प्रवाहित, निगलने को साशयित ।
तब, दूर मन इससे रहो , भव पार यदि हो आशयित ।।
रचयिता ----कवि सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञातत '
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें