रविवार, 14 जून 2015

दूर मन इससे रहो 
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त्रिवली उभरती उदर पर , तटिनी तरंग उछाल ज्यों ।
उरोज युग्म चकोर द्वय , करते उमंग धमाल त्यों ।
मुख कमल सरिता प्रवाहित, निगलने को साशयित ।
तब, दूर मन इससे रहो , भव पार यदि हो आशयित ।।
रचयिता ----कवि सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञातत '

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