अंग दिखाकर रिझा रही
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अंग दिखाकर रिझा रही , नहीं नियंत्रण आप ।
प्रकृति को झुठला रही , या वाणिज्यिक जाप ?
सागर तट की हरकतें , गंगा तट ना ठीक ।
जो गोबर गौरी बने , हाथ लगे ना नीक ।।
सर्वांग ही जब करे , काम जागरण केलि ।
मदन बाण घायल पुरूष , भय तजि करता मेलि ।।
बराबरी ना ,उच्चता ,माता - सा सम्मान ।
दूर करें पर नग्नता , तन ढंकता परिधान ।।
शीत ठंड गोपन जहाॅं , वैसा वहाॅं विचार ।
उचित अगर आचार हो , कोई नहीं विकार ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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अंग दिखाकर रिझा रही , नहीं नियंत्रण आप ।
प्रकृति को झुठला रही , या वाणिज्यिक जाप ?
सागर तट की हरकतें , गंगा तट ना ठीक ।
जो गोबर गौरी बने , हाथ लगे ना नीक ।।
सर्वांग ही जब करे , काम जागरण केलि ।
मदन बाण घायल पुरूष , भय तजि करता मेलि ।।
बराबरी ना ,उच्चता ,माता - सा सम्मान ।
दूर करें पर नग्नता , तन ढंकता परिधान ।।
शीत ठंड गोपन जहाॅं , वैसा वहाॅं विचार ।
उचित अगर आचार हो , कोई नहीं विकार ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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