कवि कल्पना ही कपट है
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सर्वांग सुन्दर नायिका , प्रिय के लिए हो अर्पिता ।
अमृतलता के तुल्य है , सन्तुष्ट जब हो हर्षिता ।
पर यदि विरक्त हुई कभी ,विषबेलि बनि अवसाद से ।
खुशियाॅं मिटाकर के सभी ,चिन्तित करे बकवाद से ।।
नयन चंचल , मुस्कुुराना , युवतियों का स्वभभाव है ।
पर, मूर्खजन तो समझता , यह रीझने का प्रभाव है ।
कमल पुष्प को लालिमा , सुन्दर प्रकृति से है मिली ।
पर , भ्रमर को अहसास ,उसके साथ से लज्जित कली ।।
मुखड़ा प्रत्यक्ष न चाॅंद है , नहिं नेत्र नीरज प्रकट है ।
नहिं स्वर्ण निर्मित देह है , कवि कल्पना ही कपट है ।
अस्थि माांस शरीर की , रचना समझता लोक है ।
फिर भी लिपटने की ललक , उत्पन्न करता शोक है ।।
( भर्त्रृहरि शतक के काव्यानुवाद से )
काव्याननुवादक ---- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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सर्वांग सुन्दर नायिका , प्रिय के लिए हो अर्पिता ।
अमृतलता के तुल्य है , सन्तुष्ट जब हो हर्षिता ।
पर यदि विरक्त हुई कभी ,विषबेलि बनि अवसाद से ।
खुशियाॅं मिटाकर के सभी ,चिन्तित करे बकवाद से ।।
नयन चंचल , मुस्कुुराना , युवतियों का स्वभभाव है ।
पर, मूर्खजन तो समझता , यह रीझने का प्रभाव है ।
कमल पुष्प को लालिमा , सुन्दर प्रकृति से है मिली ।
पर , भ्रमर को अहसास ,उसके साथ से लज्जित कली ।।
मुखड़ा प्रत्यक्ष न चाॅंद है , नहिं नेत्र नीरज प्रकट है ।
नहिं स्वर्ण निर्मित देह है , कवि कल्पना ही कपट है ।
अस्थि माांस शरीर की , रचना समझता लोक है ।
फिर भी लिपटने की ललक , उत्पन्न करता शोक है ।।
( भर्त्रृहरि शतक के काव्यानुवाद से )
काव्याननुवादक ---- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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