मुञ्चित न तृष्णा ध्यान से
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योगियों के हृदय में ही,
वास करते जो सदा ।
वे ज्ञानरूप प्रदीप्त शंकर,
मोह तम को हरें सदा ।।
घुटन सम लगते रहे हैं ,
समझदारी के विषय ।
विद्वान जन ईर्ष्या करें,
पद प्राप्त को अधिकार मय ।।
सुख नहीं है तनिक भी ,
संसार कर्मों से कभी ।
भयभीत रखते सुकर्म भी ,
सुखकर्म दु:खदायी सभी ।।
धनलोभ में कया-क्या नहीं,
हमने किया इस लोक में ?
खोद डाले भूमि गिरि ,
मोती तलाशे भोग में ।।
करते रहे हैं चापलूसी ,
सिध्दियाॅं शमशान से ।
अफसोस कुछ भी ना मिला ,
मुञ्चित न तृष्णा ध्यान से।।
सब योग की माला जपें ,
पर भोग पर न लगाम है ।
भटकाव के इस कृत्य को
मेरा सविनय प्रणाम है ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय ,अविज्ञात ।
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योगियों के हृदय में ही,
वास करते जो सदा ।
वे ज्ञानरूप प्रदीप्त शंकर,
मोह तम को हरें सदा ।।
घुटन सम लगते रहे हैं ,
समझदारी के विषय ।
विद्वान जन ईर्ष्या करें,
पद प्राप्त को अधिकार मय ।।
सुख नहीं है तनिक भी ,
संसार कर्मों से कभी ।
भयभीत रखते सुकर्म भी ,
सुखकर्म दु:खदायी सभी ।।
धनलोभ में कया-क्या नहीं,
हमने किया इस लोक में ?
खोद डाले भूमि गिरि ,
मोती तलाशे भोग में ।।
करते रहे हैं चापलूसी ,
सिध्दियाॅं शमशान से ।
अफसोस कुछ भी ना मिला ,
मुञ्चित न तृष्णा ध्यान से।।
सब योग की माला जपें ,
पर भोग पर न लगाम है ।
भटकाव के इस कृत्य को
मेरा सविनय प्रणाम है ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय ,अविज्ञात ।
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