सोमवार, 15 जून 2015

तन ढॅंकता आदिम मानव भी 
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मरकट जैसे जानवर से ही , वर्षों के सतत परिवर्तन से ।
अस्तित्व में आया रूप एक , रचनात्मक उत्परिवर्तन से ।
पत्तों ,छालों ,मृगछालों से, तन ढॅंकता आदिम मानव भी ।
सिलसिला सभ्यता का जारी , नंगा तब कहीं न दानव भी ।।
भाॅंति - भाॅंति की विधा खोज , तन कपड़े स्वच्छ बना ली है ।
जल थल नभ सर्वत्र ही तूनेे , विजय ध्वजा फहरा ली है ।
जीने के लिए सुखमय जीवन , कितनी उन्नति कर ली तूने ।
फिर किया प्रकृति से अनुकूलन , तू लगे गगन को भी छूने ।।
तन ढॅंकने को शिष्टता कहा , अश्लील की परिभाषा भी गढ़ा ।
जीने की कलाएॅं विकसित कर , उन्नति के पथ पर कदम बढ़ा ।
तू पारदर्शिता वरण किया , पर , गोपनीयता शिष्ट कहा ।
जबतक विचार था स्वच्छ तेरा , आॅंखों में हया विशिष्ट रहा ।।
आया तूफानी परिवर्तन , प्रतियोगी हुआ है नंगापन ।
तन से कपड़े हटने भी लगे , दिखलाते मन का गन्दापन ।
देखें नंगी अॅंगड़ाई भी , अंगों से आॅंख सेंकाई भी ।
कामुक संगीत , गवाई भी , हो नारी संग पराई भी ।।
फिर भी विचलित ना होंगे हम , तन मन को बाॅंध रखें हरदम ।
नैसर्गिक भेद करेंगे कम , योगी बनने का यह दमखम ।
कथनी करनी का यह अन्तर , ही अनाचार का मूल बना ।
पहले उत्पीड़न नारी का , पर समीकरण अब उलट बना ।।
आधुनिक योग की परिभाषा , आए दिन होता बलात्कार ।
अब पुलिस का जीना भी दूभर, शिक्षित समाज का चमत्कार ।
क्या बचा न कोई अब नेता , सच्ची अभिनेत्री अभिनेता ?
या समाज का अध्येता , जो निर्वस्त्रों को ढॅंक देता ।।
जो धन वैभव से से ऊपर उठ , एक स्वस्थ आचरण बना सके ।
तन के सौन्दर्य सफाई - सा , मन को भी निर्मल करा सके ?
उनका ही होगा श्रेष्ठ योग , उत्तम आचरण बनाने में ।
कलुषित कुत्सित आयासों को , संस्कार से त्वरित हटाने में ।।
रचयिता --- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '

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