बुधवार, 17 जून 2015

उजाला 
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देखा नहीं उजाला 
एक लंबे समय से,
चतुर्दिक व्याप्त घुप्प अंधेरे के कारण,
या देख ही नहीं सका उसे
उपयुक्त दृष्टि के अभाव में
याकि देख ही नहीं सकते उसे
बिना उसकी सहायता के
आँखें रहते हुए भी।
रखा गया दूर, शायद
सायाश मुझे ,
रखने के लिए बरकार अंतर
दृष्टिहीन और द्रष्टा के।
रहते हुए बिना रोशनदान के
तहखाने में भी,
देख ही लेता है मन
छाई हुई बदली को,
सूरज की गर्मी को,
आगामी आँधी को,
और भेदभाव को भी
अन्दर उनके
जिनके लिए क्या कुछ नहीं किया
तथाकथित मूढ श्रमिकों नें।
जबकि
भाव को नफरत और प्यार के
देख लेता है जानवर भी
जिस दृष्टि से,
उससे भी विकसित
तीसरी आँख-- मन की
है उनके पास भी।
रचयिता ------- सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञात '

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