सोमवार, 15 जून 2015

डूबो मत श्रृंगार में 
--------------------
शान्त करुण वत्सल रहो , हास्य प्रेम के संग ।
ऱौद्र भयानक वीर रस, भी प्रकटे रंग -ढंग ।।
दस रस में श्रृंगार का , उचित है दसवाॅं भाग ।
डूबो मत श्रृंगार में , छोड़ अनैतिक राग ।।
श्रृंगार रस लिप्त जब , हुए देव संतप्त ।
दनुजों ने कर आक्रमण उनको कर दी त्रस्त ।।
रूप मोहिनी विष्णु से ,असुरों का संहार ।
क्रूर और कायर करे , मोह से पाओ पार ।।
देश भक्ति संगीत से , वीर भाव संचार ।
जोश में आकर सैन्यदल , आहुति को तैयार ।।
बाल सुलभ क्रीड़ा निरख , वत्सल रस संचार ।
अचरज कोई देखकर , अद्भुत रस आगार ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें