भोोग और आसक्ति
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विश्वसुन्दरी अमुक से , प्रेम करें सब लोग ।
क्या चुनती कूड़ा भी है ,उनके प्रेम के योग।।
अपनी गलती भुगतना , तनिक नहीं आश्चर्य ।
एक पात्र ईंधन- अनल , सोच स्वयं तातपर्य ।।
भर जो गया मन लास्य से , या मनभाया अन्य ।
लांछित करके विलग हो , तीजे के संग धन्य ।।
बैर भाव मैत्री गई , शील गया जो नंग ।
शान्ति गई तो सब गया , जीवन गया बेढंग ।।
जन्मजात रावण नहीं , होता कोई व्यक्ति।
पतन मार्ग गामी करे , भोग और अासक्ति ।।
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विश्वसुन्दरी अमुक से , प्रेम करें सब लोग ।
क्या चुनती कूड़ा भी है ,उनके प्रेम के योग।।
अपनी गलती भुगतना , तनिक नहीं आश्चर्य ।
एक पात्र ईंधन- अनल , सोच स्वयं तातपर्य ।।
भर जो गया मन लास्य से , या मनभाया अन्य ।
लांछित करके विलग हो , तीजे के संग धन्य ।।
बैर भाव मैत्री गई , शील गया जो नंग ।
शान्ति गई तो सब गया , जीवन गया बेढंग ।।
जन्मजात रावण नहीं , होता कोई व्यक्ति।
पतन मार्ग गामी करे , भोग और अासक्ति ।।
------ कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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