गुरुवार, 18 जून 2015

थक चुका या शान्त है मन
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कठिन श्रम से हैं सजाए ,
होश जब से हैं सम्भाले ,
कर्म से निज भाग्य तूने ,
उर्वरक संस्कार डाले ।
भूमि कंटकमय पड़ीथी , 
चाव पर , मन में संजोए ,
आॅंसुओं के जल से सींचे ,
आस के कुछ बीज बोए ।
लहलहाता विटप है अब ,
पथिक जन विश्रान्ति पाते ,
फूल फल छाया घनेरी 
विहॅंस पंछी गीत गाते ।
सन्निकट ठहराव दीखे ,
मन सुस्थिर पाॅंव धीमें ,
थक चुका या शान्त है मन ,
जो चला गति वायु ही में ।।
सर्वानन्द पाण्डेय , "अविज्ञात "

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