बुधवार, 17 जून 2015

बनो एक
आपस में है जो द्वेष - भाव ,
सब करे दूर नहिं वश के एक ।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईशाई ,
जैन बौध सोचें हों एक ।।
जब ब्रम्ह एक उद्देश्य एक ,
जीवन यापन का ढंग एक ।
सबका मन्दिर मस्जिद गुरु द्वारा ,
और चर्च आराधक एक ।।
जनपद तो बने प्रदेश एक ,
उससे भी ऊपर राष्ट्र एक ।
पर राष्ट्र में भी मानव रहते ,
सर्वोपरि अपना विश्व एक ।।
जिसमें मानव सब एक - से है ,
जीवन की ललक सब में है एक ।
मानव तो प्रेम पुजारी है ,
नियन्ता सबकी प्रकृति एक ।।
बन प्रकृतिस्थ उदार बनो ,
मानवता कहलो धर्म एक ।
जातीयता का संजाल हटा ,
उस जाल को काटो बनो एक ।।

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