अब तो छोड़ो टेक
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पुंसत्व हिंसा नहीं , मन पर कसो लगाम ।
मर्द बनो मातृत्व को , मन से करो सलाम ।।
नारी कोई वस्तु ना , यूज करो दो फेंक ।
बदली कपटी सोच को , अब तो छोड़ो टेक ।।
पिता पुत्र भाई करे , एक से आॅंखें चार ।
वही कृतय नारी करे , तो घोषित अपराध ।।
बहुत मूर्ख हैं बना चुके , रबर स्टैंप समान ।
अन्नदात्री सरस्वती , लक्ष्मी दुर्गा मान ।।
देवी इनको मत कहो , मानव की सन्तान ।
अपने जैसा ही समझ , हाड़ मांस इन्सान ।।
सुख दुख की अनुभूतियाॅं , शीतलता और ठंड।
नारी को भी कष्ट दे , लू गरमी परचण्ड ।।
सहानुभूति समसामयिक , घटता दिखे न पाप ।
जागृत नारी वोट तो , जगता संसद खाप ।।
औरत होने की सजा , उचित नहीं यह बात ।
मान करो माॅं बहन का , छोड़ कुचेष्टा घात ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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पुंसत्व हिंसा नहीं , मन पर कसो लगाम ।
मर्द बनो मातृत्व को , मन से करो सलाम ।।
नारी कोई वस्तु ना , यूज करो दो फेंक ।
बदली कपटी सोच को , अब तो छोड़ो टेक ।।
पिता पुत्र भाई करे , एक से आॅंखें चार ।
वही कृतय नारी करे , तो घोषित अपराध ।।
बहुत मूर्ख हैं बना चुके , रबर स्टैंप समान ।
अन्नदात्री सरस्वती , लक्ष्मी दुर्गा मान ।।
देवी इनको मत कहो , मानव की सन्तान ।
अपने जैसा ही समझ , हाड़ मांस इन्सान ।।
सुख दुख की अनुभूतियाॅं , शीतलता और ठंड।
नारी को भी कष्ट दे , लू गरमी परचण्ड ।।
सहानुभूति समसामयिक , घटता दिखे न पाप ।
जागृत नारी वोट तो , जगता संसद खाप ।।
औरत होने की सजा , उचित नहीं यह बात ।
मान करो माॅं बहन का , छोड़ कुचेष्टा घात ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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