मजे लूटते पग बढ़े
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तितली ज्यों रसलीन है , भाॅंति - भाॅंति के फूल ।
भौंरे भी तो प्रकृति से , मंडराते भय भूल ।।
नर का मादा से मिलन , है स्वभाव अनुकूल ।
पर पशुवत व्यवहार तो , अनुशासन प्रतिकूल ।।
प्रतिस्पर्धा भोग की , जिससे धन की होड़ ।
धनिक सभी सुख भोगते , नैतिकता को छोड़ ।।
मजे लूटते पग बढ़े , ना विचार किस ओर ।
आरोहण , उत्कर्ष या , उतरे नर्क में घोर ? ?
कुचला चाहे कुचलना , दबा दबाए जाग ।
दुर्बल सबल बनें सभी , ना बदले की आग ।।
रचयिता --- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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तितली ज्यों रसलीन है , भाॅंति - भाॅंति के फूल ।
भौंरे भी तो प्रकृति से , मंडराते भय भूल ।।
नर का मादा से मिलन , है स्वभाव अनुकूल ।
पर पशुवत व्यवहार तो , अनुशासन प्रतिकूल ।।
प्रतिस्पर्धा भोग की , जिससे धन की होड़ ।
धनिक सभी सुख भोगते , नैतिकता को छोड़ ।।
मजे लूटते पग बढ़े , ना विचार किस ओर ।
आरोहण , उत्कर्ष या , उतरे नर्क में घोर ? ?
कुचला चाहे कुचलना , दबा दबाए जाग ।
दुर्बल सबल बनें सभी , ना बदले की आग ।।
रचयिता --- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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