रहम का दे वरदान प्रिये
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धन बुद्धि ज्ञान ऐश्वर्य धाम
से पुष्ट न तव अभिमान प्रिये ।
निज स्वाभिमान तब चरणों में
रख देता तुमको मान प्रिये ।।
मैंने भी जलाए पाॅंच दीप
ले पंचभूत से दान प्रिये ।
पर जगमग इनको कर न सका
टूटा मेरा अभिमान प्रिये ।।
तुमने सर्व्व दिा मुझको
तुम हो हीरों की खान प्रिये ।
मैं याचक देता क्या तुझको
कर सका न कुछ अवदान प्रिये ।।
यह लौकिक खेल निराला है
मैंने मानी अब हार प्रिये ।
मेरा दो वक्त निवाला है
अब सबकुछ तुझपर वार प्रिये ।।
सहजीवन का जो सार इष्ट
वह ही वीणा का तार प्रिये ।
पाया ना तुमको सत्यनिष्ठ
विगलित मन का उद्गार प्रिये ।।
कुछ पल जीवन के हैं बाकी
नैया अब है मझधार प्रिये ।
तू स्वयं सिद्ध नौकायन की
ले पकड़ कठिन पतवार प्रिये ।।
जो चित्र उकेरे हैं हमने
नव रंग से इन्हें सॅंवार प्रिये ।
तू कुशल चितेरा बनकर के
मनमर्जी कर श्रृंगार प्रिये ।।
मुक्त चाल उन्मुक्त भाव से
कर पूरे अरमान प्रिये ।
अपने - अपनों े चुनाव से
रहम का े वरदान प्रिये ।।
रचिता --- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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धन बुद्धि ज्ञान ऐश्वर्य धाम
से पुष्ट न तव अभिमान प्रिये ।
निज स्वाभिमान तब चरणों में
रख देता तुमको मान प्रिये ।।
मैंने भी जलाए पाॅंच दीप
ले पंचभूत से दान प्रिये ।
पर जगमग इनको कर न सका
टूटा मेरा अभिमान प्रिये ।।
तुमने सर्व्व दिा मुझको
तुम हो हीरों की खान प्रिये ।
मैं याचक देता क्या तुझको
कर सका न कुछ अवदान प्रिये ।।
यह लौकिक खेल निराला है
मैंने मानी अब हार प्रिये ।
मेरा दो वक्त निवाला है
अब सबकुछ तुझपर वार प्रिये ।।
सहजीवन का जो सार इष्ट
वह ही वीणा का तार प्रिये ।
पाया ना तुमको सत्यनिष्ठ
विगलित मन का उद्गार प्रिये ।।
कुछ पल जीवन के हैं बाकी
नैया अब है मझधार प्रिये ।
तू स्वयं सिद्ध नौकायन की
ले पकड़ कठिन पतवार प्रिये ।।
जो चित्र उकेरे हैं हमने
नव रंग से इन्हें सॅंवार प्रिये ।
तू कुशल चितेरा बनकर के
मनमर्जी कर श्रृंगार प्रिये ।।
मुक्त चाल उन्मुक्त भाव से
कर पूरे अरमान प्रिये ।
अपने - अपनों े चुनाव से
रहम का े वरदान प्रिये ।।
रचिता --- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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