आदरणीय मित्रों क्या आपने कभी यह विचार किया है कि बौध धर्म के विस्तार के पीछे करूणा ही प्रधान है जो वास्तव में मनुष्य बने रहने के लिए एक प्रमुख प्रेरक तत्व है ?
अपनी एक कविता में मैंने लिखा है --- " वियोगी नहीं था , पहला कवि । " इस कविता के दो पद यहाॅं सन्दर्भानुरूप प्रस्तुत हैं -----
बचा था जोड़े का जो क्रौंच ,ध्यान में कवि के उसका त्रास ।
सामने उसके हत युग्मांश , न थी जिसके मिलने की आस ।
हृदय में करुणा का आधान , उच्चरित मुनि के मुख से गीत ।
आदि कविता ही पुष्ट प्रमाण ,मृत था पंछी का मनमीत ।।
कहना उसे वियोग का काव्य , बात यह नहीं मान्य रससिद्ध ।
हुआ तब मीथक यह त्रुटिपूर्ण , रसात्मक भाव हो रहा विद्ध ।।
आप मित्रों के विचारार्थ मैं करूण रस पर अपने संक्षिप्त विचार प्रकट करने का सविनय प्रयास किा है । इसपर आपकी सहमति या असहमति के दो शब्द सादर आमंत्रित हैं ।उसके बाद य़ह पूरी कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत करूॅंगा ।
आपका ही ----- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
अपनी एक कविता में मैंने लिखा है --- " वियोगी नहीं था , पहला कवि । " इस कविता के दो पद यहाॅं सन्दर्भानुरूप प्रस्तुत हैं -----
बचा था जोड़े का जो क्रौंच ,ध्यान में कवि के उसका त्रास ।
सामने उसके हत युग्मांश , न थी जिसके मिलने की आस ।
हृदय में करुणा का आधान , उच्चरित मुनि के मुख से गीत ।
आदि कविता ही पुष्ट प्रमाण ,मृत था पंछी का मनमीत ।।
कहना उसे वियोग का काव्य , बात यह नहीं मान्य रससिद्ध ।
हुआ तब मीथक यह त्रुटिपूर्ण , रसात्मक भाव हो रहा विद्ध ।।
आप मित्रों के विचारार्थ मैं करूण रस पर अपने संक्षिप्त विचार प्रकट करने का सविनय प्रयास किा है । इसपर आपकी सहमति या असहमति के दो शब्द सादर आमंत्रित हैं ।उसके बाद य़ह पूरी कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत करूॅंगा ।
आपका ही ----- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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