डोरी
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हमको पतंग की तो दिखती नहींं है डोरी ।
इस मन मतंग की तो अदृश्य शक्ति कोई ।
अज्ञात रूप में ही इसका खिंचाव जारी ।
अदृश्य डोर से ही चलती है दुनियादारी ।
उन्मुक्त आसमां में ऊॅंचाइयाॅं भी छू लें ।
देवत्व भी वरण हो मनुष्यता न भूलें ।
श्रेष्ठता मिले तो फिर श्रेष्ठतम को चूमें।
सबको ही साथ लेकर मनुष्यता मेंं झूमें ।
अभ्युदये क्षमा हो मदान्धता है भोरी ।
भूलें न हों किसी से यह कल्पना है कोरी ।।
रचयिता------ सर्वानन्द पाण्डेय ,अविज्ञात ।
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हमको पतंग की तो दिखती नहींं है डोरी ।
इस मन मतंग की तो अदृश्य शक्ति कोई ।
अज्ञात रूप में ही इसका खिंचाव जारी ।
अदृश्य डोर से ही चलती है दुनियादारी ।
उन्मुक्त आसमां में ऊॅंचाइयाॅं भी छू लें ।
देवत्व भी वरण हो मनुष्यता न भूलें ।
श्रेष्ठता मिले तो फिर श्रेष्ठतम को चूमें।
सबको ही साथ लेकर मनुष्यता मेंं झूमें ।
अभ्युदये क्षमा हो मदान्धता है भोरी ।
भूलें न हों किसी से यह कल्पना है कोरी ।।
रचयिता------ सर्वानन्द पाण्डेय ,अविज्ञात ।
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