क्या बतलाओगी मुझे त्रास ?
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आरूढ़ पवन के झोंके पर ,एक वारिबूंद वातायन से ।
झटके में आकर गालों पर , पूछे अवसाद भरे मन से ।
पल निज वियोग को विस्मृतकर , बोली सस्नेह विरहीअलि से ।
तव गौर वर्ण क्यों श्याम हुआ , देखे क्या निश्चल नयनों से ?
माथे की बिंदिया स्याह पड़ी , हैं नयन युगल बिन काजल के ।
एकाकी में सिमटी हो क्यों , कोमल कर हैं बिन कंगन के ।
था रक्त कपोल गुलाल भरा , आश्चर्य , पड़ा मुर्झाया है ।
मिट गई अधर की अरुणाभा , मस्तक पर सीकन आया है ।
चंचलता नयनों का विलुप्त , स्थिर एकटक क्या देख रही ।
केयूर बन्ध की मोहकता , वह छटा कहाॅं , क्यों मूक बनी ।
वह शोख अदा अन्दाज कहाॅं ,जिसमें रहता था मुक्त हास ।
क्यों कृशकाय होती जाती , बतलाओगी क्या , मुझे त्रास ।
परिजन क्या कोई संकट में , या स्वास्थ्य तुम्हारा ठीक नहीं ।
या स्नेह में ह्रास हुआ प्रिय के , ब्यवहार है या अनुकूल नहीं ।
सुख - दुख दोनो ही साथी हें , आॅंखों में आॅंसू ठीक नहीं ।
मन की बातें इस सखि से बता , तू बिना छुपाए सही - सही ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
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आरूढ़ पवन के झोंके पर ,एक वारिबूंद वातायन से ।
झटके में आकर गालों पर , पूछे अवसाद भरे मन से ।
पल निज वियोग को विस्मृतकर , बोली सस्नेह विरहीअलि से ।
तव गौर वर्ण क्यों श्याम हुआ , देखे क्या निश्चल नयनों से ?
माथे की बिंदिया स्याह पड़ी , हैं नयन युगल बिन काजल के ।
एकाकी में सिमटी हो क्यों , कोमल कर हैं बिन कंगन के ।
था रक्त कपोल गुलाल भरा , आश्चर्य , पड़ा मुर्झाया है ।
मिट गई अधर की अरुणाभा , मस्तक पर सीकन आया है ।
चंचलता नयनों का विलुप्त , स्थिर एकटक क्या देख रही ।
केयूर बन्ध की मोहकता , वह छटा कहाॅं , क्यों मूक बनी ।
वह शोख अदा अन्दाज कहाॅं ,जिसमें रहता था मुक्त हास ।
क्यों कृशकाय होती जाती , बतलाओगी क्या , मुझे त्रास ।
परिजन क्या कोई संकट में , या स्वास्थ्य तुम्हारा ठीक नहीं ।
या स्नेह में ह्रास हुआ प्रिय के , ब्यवहार है या अनुकूल नहीं ।
सुख - दुख दोनो ही साथी हें , आॅंखों में आॅंसू ठीक नहीं ।
मन की बातें इस सखि से बता , तू बिना छुपाए सही - सही ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
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