ठहर तनिक लो सोच
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वीरांगना वारांगना , के चरित्र हैं भिन्न ।
यथायोग्य स्वागत मिले , आश्चर्य,क्यों खिन्न ?
जब जो भी जैसा करे , मिले योग्य सम्मान ।
मन्दिर में झुक हर कोई , करता कीर्तन गान ।।
कुत्तों जैसा बदलना , जीवन साथी रोज ।
असामाजिक कृत्य यह , ठहर तनिक लो सोच ।।
साथ में सारे पुरुष तो , तन ढॅंकते भरपूर ।
हया शर्म के त्याग से , क्यों दिखलाती नूर ?
गर्मी इनकी देखिए , तन को कॅंपाती ठंड ।
साथी पहने कोट है , ब्लाउज है शतखण्ड ।।
माना तेरे अंग हैं , पर रहना निर्वस्त्र ।
सोचो किस उद्देश्य से , इन्हें बनाती अस्त्र ?
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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वीरांगना वारांगना , के चरित्र हैं भिन्न ।
यथायोग्य स्वागत मिले , आश्चर्य,क्यों खिन्न ?
जब जो भी जैसा करे , मिले योग्य सम्मान ।
मन्दिर में झुक हर कोई , करता कीर्तन गान ।।
कुत्तों जैसा बदलना , जीवन साथी रोज ।
असामाजिक कृत्य यह , ठहर तनिक लो सोच ।।
साथ में सारे पुरुष तो , तन ढॅंकते भरपूर ।
हया शर्म के त्याग से , क्यों दिखलाती नूर ?
गर्मी इनकी देखिए , तन को कॅंपाती ठंड ।
साथी पहने कोट है , ब्लाउज है शतखण्ड ।।
माना तेरे अंग हैं , पर रहना निर्वस्त्र ।
सोचो किस उद्देश्य से , इन्हें बनाती अस्त्र ?
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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