का लेके शिव के मनाईं हो , शिव मानत नाहीं !
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पूड़ी मिठाई शिव के मनहीं न भावे ,
मनहीं ननभावे, शिव के मनहीं न भावे
भाॅंग धतूर कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
हाथी घोड़ा शिव के मनहीं न भावे
मनहीं न भावे , शिव के मनहीं न भावे
बॅंसहा बैल कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
रंग गुलाल शिव के मनहीं नभावे
मनहीं नभावे , शिव के मनहीं न भावे
भस्म भभूत कहाॅं पईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
कूआॅं तालाब शिव के मन ही न भावे
मन ही न भावे , शिव के मनहीं न भावे
गंगा क धार कैसे लाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
देव मनुज शिव के मनहीं न भावें
मनहीं न भावें , शिव के मनहीं न भावें
भूत बैताल कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
शाला दुशाला शिव के मनहीं न भावे
मनहीं न भावे , शिव के मनहीं न भावे
मृगछाला कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
हीरा मोती सोना मनहीं न भावे
मनहीं न भावे , शिव के मनहीं न भावे
साॅंप क माला कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
ढोल मजीरा शिव के मनहीं न भावे
मनहीं न भावे , शिव के मनहीं न भावे
डिमक डमरु कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
कोठा अटारी शिव के मनहीं नभावे
मनहीं नभावे , शिव के मनहीं न भावे
भूधर कैलाश कैसे लाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
घरीभर भजन मे मन नहीं लागे
मन नहीं लागे हो , मन नाहीं लागे
कैसे भटकल मन के मनाईं हो ,शिव मानत नाहीं ।।
रउरे चरनियाॅं में काशीजी अइलीं
काशीजी अइलीं , गंगा तीरे अइलीं
अबतजि शिव कहाॅं जाईं हो , शिव मानत नहीं ।।
जैसे अजामिल के अपनवलीं ,
पानी मे गज के ग्राह से बचवलीं,
ऊहे सुमिरन कैसे पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
अपनी भगतिया में हमके डुबाईं
सद्गति हमरो , रउवें लगाईं
सर्वानन्द तजि पाईं हो, शिव मानत नाहीं ।।
कैसे के शिव के मनईं हो शिव मानत नाहीं ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय, ' अविज्ञात '
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पूड़ी मिठाई शिव के मनहीं न भावे ,
मनहीं ननभावे, शिव के मनहीं न भावे
भाॅंग धतूर कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
हाथी घोड़ा शिव के मनहीं न भावे
मनहीं न भावे , शिव के मनहीं न भावे
बॅंसहा बैल कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
रंग गुलाल शिव के मनहीं नभावे
मनहीं नभावे , शिव के मनहीं न भावे
भस्म भभूत कहाॅं पईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
कूआॅं तालाब शिव के मन ही न भावे
मन ही न भावे , शिव के मनहीं न भावे
गंगा क धार कैसे लाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
देव मनुज शिव के मनहीं न भावें
मनहीं न भावें , शिव के मनहीं न भावें
भूत बैताल कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
शाला दुशाला शिव के मनहीं न भावे
मनहीं न भावे , शिव के मनहीं न भावे
मृगछाला कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
हीरा मोती सोना मनहीं न भावे
मनहीं न भावे , शिव के मनहीं न भावे
साॅंप क माला कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
ढोल मजीरा शिव के मनहीं न भावे
मनहीं न भावे , शिव के मनहीं न भावे
डिमक डमरु कहाॅं पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
कोठा अटारी शिव के मनहीं नभावे
मनहीं नभावे , शिव के मनहीं न भावे
भूधर कैलाश कैसे लाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
घरीभर भजन मे मन नहीं लागे
मन नहीं लागे हो , मन नाहीं लागे
कैसे भटकल मन के मनाईं हो ,शिव मानत नाहीं ।।
रउरे चरनियाॅं में काशीजी अइलीं
काशीजी अइलीं , गंगा तीरे अइलीं
अबतजि शिव कहाॅं जाईं हो , शिव मानत नहीं ।।
जैसे अजामिल के अपनवलीं ,
पानी मे गज के ग्राह से बचवलीं,
ऊहे सुमिरन कैसे पाईं हो , शिव मानत नाहीं ।।
अपनी भगतिया में हमके डुबाईं
सद्गति हमरो , रउवें लगाईं
सर्वानन्द तजि पाईं हो, शिव मानत नाहीं ।।
कैसे के शिव के मनईं हो शिव मानत नाहीं ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय, ' अविज्ञात '
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