बुधवार, 17 जून 2015

बहकें नहीं जो , वे तरें
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श्रृंगार रस पादप पनपता ,मेघ से ज्यों सींचकर ।
कामदेव कामांग को , विकसित करें त्यों भींचकर ।।
मधुर प्रिय वाणी मदन , करता किशोर को जीतकर ।
टकटकी से तरुणियों को , देखता है प्रीतिकर ।।
युवती भी पूनम चाॅंद - सी , आकृष्ट युवकों को करे ।
पर , जवानी जोश में , बहकें नहीं जो वे तरें ।।
मित्रों ! युवक युवतियों के लिए विशेष रूप में मुझे पसंद ये पंक्तियाॅं भेंट स्वरूप हैं ।शायद यह उनके लिए उपयोगी हो । किशोर वय में कुमार्गी हो जाने का खतरा अधिक रहता है ।यह वयकाल जहाॅं उर्जा और उत्साह से लबरेज होता है , वहीं भटकाव के लिए भी अधिकतम सम्भाब्य होता है । बस , यहॅं सम्भले कि भविष्य में उन्नत जीवन का सुमार्ग प्रशस्त समझें ।
" भर्तृहरि शतक " का " शतकत्रयी " नाम से जो काव्यानुवाद मैंने किया है , उसी की यह एक कविता है ।इस पर आप सभी मत्रों की बेबाक टिप्पणी का सादर स्वागत करूॅंगा । जय हो ।
आपका वही --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात
प्रशासक ---" सर्वानन्दम् परमानन्दम् " एवं " अटल कवि परिवार "

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