दिन न बनेगा रात
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शक्ति नहीं , विद्या नहीं , कौशल भी अतिक्षीण ।
आकर्षण को कुछ नहीं, बने बलात प्रवीण ।।
नीम न मीठी हो कभी , गुड़- घी सींचे लोक ।
मोदक तीता ना लगे , तब क्यों भारी शोक ?
अनुचित तृष्णा दमित कर , बनो नेक इंसान ।
समय , जगह ,वातावरण ,का सदैव संज्ञान ।।
योग्य बनो पहले स्वयं , तब अभीष्ट सम्मान ।
यथायोग्य सबकुछ मिले ,मानऔर अपमान ।।
संगत जैसी आपकी , वैसी रंगत होय ।
बोये पेड़ बबूल का , आम कहाॅं से होय ?
आप भला तो जग भला , भीतर अपने देख।
अन्दर ही सब रंग हैं , जैसा भर आरेख ।।
अलंकार क्या रूप को , शस्त्र से सजे न बीर ।
अति आचरण न शोभता , अविवेक ना धीर ।।
भूषण उत्तम शील है ,कृत्य सभी शुभ कर्म ।
समझदार संकेत का , ठीक समझते मर्म ।।
दुर्बल सब मिलि बल करें ,करें जो चाहें सोय ।
हास्यलास्य सौन्दर्यसे,ललित-लसितसब कोय।।
कुत्तों का दुम बदलना ,स्वयं में टेढ़ी बात ।
मनमाने की शोच से , दिन न बनेगा रात ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात ' ।
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शक्ति नहीं , विद्या नहीं , कौशल भी अतिक्षीण ।
आकर्षण को कुछ नहीं, बने बलात प्रवीण ।।
नीम न मीठी हो कभी , गुड़- घी सींचे लोक ।
मोदक तीता ना लगे , तब क्यों भारी शोक ?
अनुचित तृष्णा दमित कर , बनो नेक इंसान ।
समय , जगह ,वातावरण ,का सदैव संज्ञान ।।
योग्य बनो पहले स्वयं , तब अभीष्ट सम्मान ।
यथायोग्य सबकुछ मिले ,मानऔर अपमान ।।
संगत जैसी आपकी , वैसी रंगत होय ।
बोये पेड़ बबूल का , आम कहाॅं से होय ?
आप भला तो जग भला , भीतर अपने देख।
अन्दर ही सब रंग हैं , जैसा भर आरेख ।।
अलंकार क्या रूप को , शस्त्र से सजे न बीर ।
अति आचरण न शोभता , अविवेक ना धीर ।।
भूषण उत्तम शील है ,कृत्य सभी शुभ कर्म ।
समझदार संकेत का , ठीक समझते मर्म ।।
दुर्बल सब मिलि बल करें ,करें जो चाहें सोय ।
हास्यलास्य सौन्दर्यसे,ललित-लसितसब कोय।।
कुत्तों का दुम बदलना ,स्वयं में टेढ़ी बात ।
मनमाने की शोच से , दिन न बनेगा रात ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात ' ।
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