बुधवार, 17 जून 2015

प्रकृति ,पर्यावरण और मनुष्य 
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प्रकृति और समस्त प्रकृत तत्वों को
देवी - देवताओं और परम पिता को भी
निजस्वार्थ में दोहन योग्य मानकर 
इनके परम हितैशी स्वभाव को आहतकर
अपने और अपनों के त्वरित भोग के लिए
स्वार्थान्धी मनुष्य चलाता है ।
पर्यावरण को ही नहीं
अपितु पृथ्वी को भी क्षत वक्षत करके
इसके वृक्षों वनों को काटकर
जलाशयों को घेरऔर पाटकर
पहाड़ोंको घनी बस्ती बसाकर
अन्तरिक्ष को भी अधिकाधिक व्यस्तकर‍
और पृथ्वी को हिरोशिमा बनाकर
आदमी चलाता है ।
नानाविध प्रदूषण से
प्रकाश संश्लेषण की
अनिवार्यत:आवश्यक जैविक प्रक्रियाको
अनवरत रूप में अवरोधित कर
जीवनाधार भोज्य - पेय पदार्थों को
अपशिष्ट करके
कुपोषण का शिकारबन
आदमी चलाता है ।
कम्प्यूटर और मोबाइल फोनका
अपने चारों ओर संजाल बनाकर
जानलेवा इलेक्ट्रो मैग्नेटिकक्षेत्र सृजित कर
फैक्ट्रियों के माध्यम से
और परमाणु भट्ठियों से
जल - थल - वायु में कचरे डालकर
असाध्य बीमारियों के कारक
रेडियोऐक्टिव अवशिष्ट उत्सर्जित कर
पूरी प्रकृति के हितैषी स्वरूप को
आदमी बिगाड़ता है ।
रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर चलाकर
जहरीली गैसैं पैदा करके
ओजोन स्तर को विदीर्ण कर
अनावश्यक आग जलाकर
पृथ्वी का तापमान बढ़ाकर
ग्लेशियरों को पिघला कर
और ऋतुचक्र को अव्यवस्थित करके
सूखा, बाढ़ तथाठंड का प्रकोप बढ़ाकर
अका मृत्यु की ओर
आदमी स्वयं को चलाता है ।
अनियंत्रित रूप में जनसंख्या बढ़ाकर
आवश्यक खाली जगह को घेरकर
निर्विकार शान्त मन में भी
कोलैप्स हो जाने तक
तीब्रतम हलचल पैदा कर ,
अपशब्दों से मनों में
कभी न बुझने लाली आग लगाकर
पृथ्वी के पर्यावरण को
अनेकविध प्रदूषणों से सान्द्रित कर
पूरी पृथ्वी के अस्तित्व को
जलजले( प्रलय ) की राह पर
सर्वाधिक विवेकशील , मतंग मनुष्य
गर्वोन्मत्त होकर चलाता है ।
--- रचयिता ----- सर्वानन्द पाण्डेय ' अविज्ञात ' ।

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