सुख या शान्ति ?
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याज्ञवल्क्य मुनि से जाकर , जिज्ञासु ने सरल सवाल किया ।
अभिधेय शान्ति या सुख प्रभुवर , ऋषियों ने क्या है विचार दिया ?
सहजबुद्धि से जिज्ञासु को ,ऋषि ने उचित जवाब दिया ।
आनन्द उद्देश्य हमारा , श्रेष्ठ जनों ने सार दिया
मिलता सुख से आनन्द क्षणिक , पर शान्ति मनोरथ स्थाई ।
सुख से तो आनन्द मात्र , पर शान्ति से परमानन्द भाई ।
आनन्द से मन न भरे , तो बेचैनी बढ़ जाती है ।
इसीलिए तो सुखी जनों को , नींद बहुत कम आती है ।
समृद्धि से भरा - पुरा जन , क्यों व्याकुल मन होता है ?
कोई कमी नहीं हो फिर भी , मन ही मन वह रोता है ।
सोच जरा उसके सुख की , वह इधर- उधर क्या टोता है ?
सुख- साधन से बोझिल मन, लगता है उसे वह ढोता है ।
सन्यासी के पीछे वह , क्यों भागा दौड़ा जाता है ?
निर्जन वन उसकी कुटियामें ,सोचो जाकर क्या पाता है ?
है अभीष्ट क्या उसे विचारो , जो वह कहीं न पाता है ?
कस्तूरी कुण्डलि में ही है , साधु उसे बतलाता है ।
निस्पृह जब हुआ तभी , रार्षि जनक बन जाता है ।
काम्य न कोई सुख तब उसको , शान्तिमना बन जाता है ।
उर्जा उसे अनूठी मिलती , सच्ची शान्ति जिसे मिलती ।
सच्ची शान्ति उसे ही प्राप्य है , नींद जिसे पूरी मिलती ।
आसक्ति से हुआ विरत , निश्चिन्त नींद है बदा उसे ।
परम शान्ति उसको हि सुलभ है , सर्वानन्द भीप्राप्य उसे ।
समाधान तो अन्तस में है , न कि बाहरी सुख साधन ।
औदार्य दया उपकार क्षमा , हैं शान्ति विटप , मन है कानन ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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याज्ञवल्क्य मुनि से जाकर , जिज्ञासु ने सरल सवाल किया ।
अभिधेय शान्ति या सुख प्रभुवर , ऋषियों ने क्या है विचार दिया ?
सहजबुद्धि से जिज्ञासु को ,ऋषि ने उचित जवाब दिया ।
आनन्द उद्देश्य हमारा , श्रेष्ठ जनों ने सार दिया
मिलता सुख से आनन्द क्षणिक , पर शान्ति मनोरथ स्थाई ।
सुख से तो आनन्द मात्र , पर शान्ति से परमानन्द भाई ।
आनन्द से मन न भरे , तो बेचैनी बढ़ जाती है ।
इसीलिए तो सुखी जनों को , नींद बहुत कम आती है ।
समृद्धि से भरा - पुरा जन , क्यों व्याकुल मन होता है ?
कोई कमी नहीं हो फिर भी , मन ही मन वह रोता है ।
सोच जरा उसके सुख की , वह इधर- उधर क्या टोता है ?
सुख- साधन से बोझिल मन, लगता है उसे वह ढोता है ।
सन्यासी के पीछे वह , क्यों भागा दौड़ा जाता है ?
निर्जन वन उसकी कुटियामें ,सोचो जाकर क्या पाता है ?
है अभीष्ट क्या उसे विचारो , जो वह कहीं न पाता है ?
कस्तूरी कुण्डलि में ही है , साधु उसे बतलाता है ।
निस्पृह जब हुआ तभी , रार्षि जनक बन जाता है ।
काम्य न कोई सुख तब उसको , शान्तिमना बन जाता है ।
उर्जा उसे अनूठी मिलती , सच्ची शान्ति जिसे मिलती ।
सच्ची शान्ति उसे ही प्राप्य है , नींद जिसे पूरी मिलती ।
आसक्ति से हुआ विरत , निश्चिन्त नींद है बदा उसे ।
परम शान्ति उसको हि सुलभ है , सर्वानन्द भीप्राप्य उसे ।
समाधान तो अन्तस में है , न कि बाहरी सुख साधन ।
औदार्य दया उपकार क्षमा , हैं शान्ति विटप , मन है कानन ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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