सोमवार, 15 जून 2015

सद्गुण तो आता श्रम से ही 
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आसक्ति को त्याग दिया ,जो करुणा का रसपान किया ।
राज- पाट - सुख छोड़ दिया ,वह परम शान्ति का गान किया ।।
बुद्ध हुुए तब शुद्धमना , बालक भी ध्रुव प्रह्लाद बने ।
इक रहजन भी वाल्मीकि बना , फिर जनकराज राजरर्षि बने ।।
बेशक सद्गुण से आकर्षण , होता है मन में सबके ही ।
गिरना होता है अनायास , सद्गुण तो आता श्रम से ही ।।
यदि आकर्षण दुर्गुण से तो , गलती कर हम ना पछताते ।
अच्छी कृतियों को देख सभी , कृतिकार के गुण हम ना गाते ।।
करें नियंत्र‍िितत आकर्षण को , उत्तम जीवन जीने को ।
उद्यत हों हम नेक चाव से , शान्त करुण रस पीने को ।।
रात में ऐसा कुछ न करें , किदिन में मुॅंह ना दिखा सकें ।
दिन में भी ऐसा न करें , कि नींद को ही अलविदा कहें ।।
रचयिता ----- कवि सर्वानन्द पाण्डडेय ,, ' अविज्ञात'

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