रविवार, 21 जून 2015

दाता 
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जो बदले में कुछ ना चाहे , विरले मिलते ऐसे दाता ।
जो कृपा अकारण बरसावे , हर गीत भलाई के गाता ।।
अधिकाधिक स्वारथ अवगाहे , कल्याण कृपा जो दिखलाता ।
अति अतिशय प्रेम जो दिखलावे , ठहरो ,परखो उसको भ्राता ।।
अधिकांश भ्रमित कर बहकावें , कौशल ठगने का उन्हें आता ।
उपकार त्याग वे दिखलावें , अवसर का परख भी उन्हें आता ।।
वे प्रेम का दल - दल दिखलावें , पग रखता जो वह फॅंस जाता ।
गिर जाने पर जो समझ आवे , हर कोशिस में धॅंसता जाता ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ।
रेलवे का योग 
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नियत समय गाड़ी चले , संरक्षित अविराम ।
मितब्ययिता बनी रहे , सुरक्षित अभिराम ।।
कभी शिकायत ना मिले , विनयशील व्यवहार ।
अनुशासन भी बना रहे , सर्वप्रिय आचार ।।
सत्यनिष्ठ सेवा रहे , कर्मनिष्ठ हों आप ।
शोभनीय हर कार्य हो , मन में रहे न ताप ।।
आदेशों निर्देश का , नियमों का सम्मान ।
नियमविहित कर्त्तव्य का , कुकृत्यों का भान ।।
सजग ध्यान के साथ ही , दूरदृष्टि से काम ।
निर्भय हो यात्री सभी , पहुॅंचे अपने धाम ।।
तीब्रगामिता , स्वच्छता ,सद्भावना पूर्ण ।
यात्रा सर्वानन्दमय ,सुविधा दें सम्पूर्ण ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय, अविज्ञात
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
मुञ्चित न तृष्णा ध्यान से
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योगियों के हृदय में ही, 
वास करते जो सदा ।
वे ज्ञानरूप प्रदीप्त शंकर,
मोह तम को हरें सदा ।।
घुटन सम लगते रहे हैं ,
समझदारी के विषय ।
विद्वान जन ईर्ष्या करें,
पद प्राप्त को अधिकार मय ।।
सुख नहीं है तनिक भी ,
संसार कर्मों से कभी ।
भयभीत रखते सुकर्म भी ,
सुखकर्म दु:खदायी सभी ।।
धनलोभ में कया-क्या नहीं,
हमने किया इस लोक में ?
खोद डाले भूमि गिरि ,
मोती तलाशे भोग में ।।
करते रहे हैं चापलूसी ,
सिध्दियाॅं शमशान से ।
अफसोस कुछ भी ना मिला ,
मुञ्चित न तृष्णा ध्यान से।।
सब योग की माला जपें ,
पर भोग पर न लगाम है ।
भटकाव के इस कृत्य को
मेरा सविनय प्रणाम है ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय ,अविज्ञात ।

गुरुवार, 18 जून 2015

सज्जन से इच्छित मित्रता ,जो प्रेम सद्गुण से करे ।
श्रेष्ठ जन से विनम्रता , अनुराग विद्या से करे ।
जो प्रीति स्त्री से करे , इन्द्रिय दमन की शक्ति हो ।
जो लोक निन्दा से डरे , ईश्वर में जिसकी भक्ति हो ।
जो त्याग दुर्जन का करे ,वह ही तो सज्जन व्यक्ति है ।
प्रणम्य वह जिसकी गुणों में ,वास्तविक अनुरक्ति है ।
भजित अगम गुण राशि तिहारो
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ललित लसित प्रभु रूप तिहारो ,
रमित सर्व जन चरण सदा ।
भजित अगम गुण राशि तिहारो ,
लभित फलित शुभ चरण सदा ।
द्रवित पदार्थ चरण रज चारो ,
तपित त्रिविध नर नमित सदा ।
अष्ट सिद्धि नव निधि सरसाओ ,
भ्रमित व्यथित मैं भक्त सदा ।
गलित पाप कर मुक्त कराओ ,
श्रमित थकित यह दास तेरा ।
पतित तृषित मन दमित कराओ ,
त्वरित करो उद्धार मेरा ।
चरित उदार कृपालु तिहारो ,
रचित भ्रमित त्रयलोक महा ।
व्यथित मथित मन त्वरित निहारो ,
अमित प्रकाश प्रभाव अहा !
भय भव से अब मुक्ति दिलाओ ,
रटित सदा उर नाम तेरा ।
भवित सहायक परम उबारो ,
गुणा गणित सब व्यर्थ मेरा ।
थक चुका या शान्त है मन
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कठिन श्रम से हैं सजाए ,
होश जब से हैं सम्भाले ,
कर्म से निज भाग्य तूने ,
उर्वरक संस्कार डाले ।
भूमि कंटकमय पड़ीथी , 
चाव पर , मन में संजोए ,
आॅंसुओं के जल से सींचे ,
आस के कुछ बीज बोए ।
लहलहाता विटप है अब ,
पथिक जन विश्रान्ति पाते ,
फूल फल छाया घनेरी 
विहॅंस पंछी गीत गाते ।
सन्निकट ठहराव दीखे ,
मन सुस्थिर पाॅंव धीमें ,
थक चुका या शान्त है मन ,
जो चला गति वायु ही में ।।
सर्वानन्द पाण्डेय , "अविज्ञात "
विचार गाॅंधी के
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सत्य अहिंसा शान्ति ही ,गाॅंधीवाद प्रतीक ।
वाह्यान्तर की शुद्धता , से आचरण पुनीत ।।
करके कहना ही उचित, केवल कहना थोथ ।
लगातार जलते रहे , बनें नही खद्योत ।।
कठिन मार्ग गामी बनें , परोपकार हो ध्येय ।
केवल करतब काम्य हो , ना अभीष्ट हो श्रेय ।।
पापी से घृणा नहीं , करें पाप को दूर ।
जीव मात्र से प्रेम हों , करें कर्म भरपूर ।।
ऊँच - नीच का भेद ना , न्यायपूर्ण आचार ।
दया , क्षमा , सौहार्द का , मन में रहे विचार ।।
सर्वानन्द पाण्डेय "अविज्ञात"
लाल बहादुर शास्त्री
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रामनगर वाराणसी में ,
एक बहादुर लाल हुआ ।
पूर्ण सादगी नेकचलन का ,
वह तो एक मिशाल हुआ ।।
उसकी श्रम सेवा करूणा से ,
पूरा देश निहाल हुआ ,
पला गरीबी में वह फिर भी ,
उसका हृदय विशाल हुआ ।।
जय जवान और जय किसान का ,
प्यारा नारा नेक दिया ,
और गरीबी उन्मूलन का ,
ओज भरा वह टेक दिया ।।
सादा जीवन उच्च सोच की ,
सीख हमें वह भेंट किया ,
प्रधान मंत्री के पद पर तो ,
उनका आदर देश किया ।।
जन्म दिन है बापू के संग ,
दोनों विश्ववन्द्य ऋषिजन ,
दोनों के थे एक - से रंग - ढंग ,
शीश झुकाते उनको जन - जन ।।
--- सर्वानन्द पाण्डेय , " अविज्ञात "
आज की कविता नहीं यह
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पाप पर ना पुण्य की जय ,
आज भी सब कह रहे यह ,
नहीं असुरों का पराजय ,
आजकी कविता नहीं यह ।‍
मर रहे बहुकाल से ये ,
पर बढ़ेआश्चर्य है यह ,
आसुरी भय त्रास बढ़ते ,
आज की कविता नहीं यह ।
रक्त बीजों से पटे हैं ,
नदी कानन और भू यह ,
एक मरता आठ आते ,
आज की कविता नहीं यह ।
कल लिया संकल्प हमने
साफ कर देंगे जमीं यह ,
पर ,मनस्वी हाथ कितने ?
आजकी कविता नहीं यह ।
पड़ रहे हैं असुर भारी ,
जी रहे हैं मौज से रह ,
मारना हर साल जारी ,
आज की कविता नहीं यह ।
विजय दशमी हम मनाते
क्रूरता को शान्त से सह
सत्य को नित ही दबाते ,
आज की कविता नहीं यह ।।
--- सर्वानन्द पाण्डेय , " अविज्ञात "
शब्द ही विषदन्त होगा
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जब हमारी सभ्यता को ,
कुटिलता का दंश होगा ।
जब कभी भी समाज में ,
रावण या कोई कंस होगा ।
कलम तब तलवार होगी ,
शब्द ही विषदन्त होगा ।
पाप का तब ही सुनिश्चित ,
मूलत: ही अन्त होगा ।
लोकोपयोगी दृष्टि का तो ,
जब कभी अपकर्ष होगा ।
शक्ति के आराधकों में ,
नाशमय संघर्ष होगा।
मानवीय विचार का तब ,
धर्ममय उत्कर्ष होगा ।
तब अनैतिक आचरण पर ,
काल का दुर्घर्ष होगा ।।
रचयिता --------
सर्वानन्द पाण्डेय ' अविज्ञात '
जब बड़े- बड़े लोगों की 
गलतियों और दोषों की 
पकड़ मुझे होती है ,
तब मजबूर हो जाता हूॅं 
यह सोचने को कि 
मेरी लालच , चोरी ,झूठ ,
व्यसन और नाइंसाफी सम्बन्धी
वैचारिक - व्यावहारिक आडम्बर को भी
वे लोग अवश्य ही देखते - परखते होंगे ,
जिन्हें अति चतुराई से
सायास छिपाते हुए ,
ढिंठाई से मैं आदर्श प्रस्तुत करता रहता हूॅं
और लोगों को ,कमोबेस
प्रभावित कर भी लेता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं
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जितना सम्भव रूप दिखाओ ,
प्यासे को नलकूप दिखाओ ।
ससमर्थ आॅंखें फैलाए ,
प्रेम पात्र भरता जाताहूॅं ।।
इसमें ही जीवन का लय है ,
इससे भिन्न तो मात्र प्रलय है ।
अमृतमय इस रूप राशि को ,
भाॅंति अनेक लिए जाता हूॅं ।।
घर केअन्दर या बाहर हो ,
एक कोशिकीय या नाहर हो ।
सबको एक सदृश पाता हूॅं ,
डबल फेस से घबराता हूॅं ।।
पूज्य भाव आसूच्य चाव से ,
अपने मन के ही चुनाव से ।
मुक्ति मिले मन को तनाव से ,
अनुकृति जाप किए जाताहूॅं ।।
पूर्ण श्लीलता की सतर्कता ,
साधन सुविधा की असक्तता ।
में भी किसी तरह इस मन को ,
प्रेम से बहलाए जाता हूॅं ।।
टोका नहीं किसी ने अब तक ,
पकड़ के बाहर ,अति ना जबतक ।
आस्वादन हर रंग रूप से ,
मन को सहलाए जाता हूॅं ।।
मिले साथ में जब भी कोई ,
बाल किशोर युवा भी सोई ।
जैसा संग रंग-ढंग वैसा ,
कौशल दर्शाए जाता हूॅं ।।
,रूप सरस पीए जाता हूॅं---।
खोट से चोट
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वस्त्र तो तेरे हैं सतखण्डी,कपड़े की क्या आई तंगी?
माता-बहन हो या रण चण्डी,जिस्म दिखाती क्यों तू नंगी?
गुलाबी तेरे सुन्दर होंठ ,लिपिस्टिक उस पर देती पोत ।
बिछाती जब शतरंजी गोट , दिखाती अपने मन का खोट ।
फूल के पंखड़ियों- से गाल ,छिपाती क्यों तू क्रीम से खाल ।
बनाकर आक्रामक तू हाल ,बदल देती दुनियाॅंं की चाल ।
सहज ही तेरी हिरनी चाल ,घटा- से बिखरे लम्बे बाल ।
सॅंवरकर ठोंके जब तू ताल ,छटा देखे हों सभी निढाल ।
रचयिता--- सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
कर्म 
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नियुक्त विधि को जो किया , कुम्भार सम रच सृष्टि को ।
अवतार दस धारण कराया , विष्णु सम समदृष्टि को ।।
भगवान भिक्षाटन किए , खप्पर थमाया रूद्र को ।
नित भ्रमण पर जिसने लगाया , शक्तिशाली सूर्य को ।।
वह कर्म सर्व प्रधान है , जीवन का लक्षण व्यंजना ।
उसके गुणों की श्रेष्ठजन , भी नित करें अभ्यर्थना ।।
मुझ - सा अकिंचन क्यों नहीं , स्वीकार उस श्रम को करे ।
जो प्रदान सबकुछ ही करे , सुख शान्ति दे ,विपदा हरे ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ।

बुधवार, 17 जून 2015

बनो एक
आपस में है जो द्वेष - भाव ,
सब करे दूर नहिं वश के एक ।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईशाई ,
जैन बौध सोचें हों एक ।।
जब ब्रम्ह एक उद्देश्य एक ,
जीवन यापन का ढंग एक ।
सबका मन्दिर मस्जिद गुरु द्वारा ,
और चर्च आराधक एक ।।
जनपद तो बने प्रदेश एक ,
उससे भी ऊपर राष्ट्र एक ।
पर राष्ट्र में भी मानव रहते ,
सर्वोपरि अपना विश्व एक ।।
जिसमें मानव सब एक - से है ,
जीवन की ललक सब में है एक ।
मानव तो प्रेम पुजारी है ,
नियन्ता सबकी प्रकृति एक ।।
बन प्रकृतिस्थ उदार बनो ,
मानवता कहलो धर्म एक ।
जातीयता का संजाल हटा ,
उस जाल को काटो बनो एक ।।
पन्द्रह अगस्त
पन्द्रह अगस्त पन्द्रह अगस्त हरभारतीय को कण्ठस्थ ।
अंग्रेज हुकूमत अपदस्थ सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
हर गाँव नगर से चली टोली जब मची खून की वह होली ।
तोपें बन्दूकें हुईं न्यस्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
जब जान पे खेले सेनानी तब ब्रिटिश फौज भी हुई त्रस्त ।
यूं हिम्मत उनकी हुई पस्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
उत्सर्ग प्राण कर गए लाल भारत का ऊँचा किए भाल ।
भय फॉंसी का भी नहीं व्यक्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
ललनाओं ने भी दिए प्राण तब ही दासता से मिली त्राण ।
स्वराज दिलाए देशभक्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
दिवंगतों की ज्योति अमर बलिदान की उनसे मिली डगर ।
शासन परदेशी हुआ ध्वस्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त ।।
श्रद्धाञ्जलि होकर संगठित करके उनको महिमामण्डित ।
उनके चरणों में विनत-प्रणत सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त
प्रकृति दमित कुविचारों से
_________________
लय में रहना लक्ष्य हमारा
पुरूष प्रकृति के संगम से
विलय-प्रलय से करें किनारा
दोनो ही तो संयम से ।।
दोनो की संतुष्टि जरूरी
समता मूलक भावों से
रहे चुनौती गैर जरूरी
सद्भावना की चावों से ।।
उर्जा का प्रस्फुरण रोक लें
बचकर वादों दावों से
कर दें मुखरित शब्द मेल के
चलकर नगरों गावों से ।।
प्रकृति परिवर्तित न कभी हो
सहानुभूति और नारों से
आक्रामक उत्तेजित भाषण
राजनीतिक गलियारों से ।।
रहन सहन का ढंग सुधारें
नीतिपरक ब्यवहारों से
रिश्तों के अनुरूप आचरण
आदमियत सुविचारों से ।।
शापित आज भी पड़ीअहल्या
प्रकृति दमित कुविचारों से
पौरुष का यह घृणित रूप है
काटो बुद्धि कुठारों से ।।

अभ्यास नहीं एकाकी का

(अपनी पत्नी जी केअनुरोध पर ' क्या बतलाओगी मुझे त्रास ' स्वरचित कविता के उत्तर स्वरूप रचित अपनी एक कविता
 ' अभ्यास नहीं एकाकी का ' प्रस्तुत कर रहा हॅं , इस उम्मीद के साथ कि आपको पसंद आए ।
थी आकुलता मुझको भी बड़ी, पल दो पल को  मनमीत मिले।
सम हृदयविदग्धा हो सम्मुख, इस व्यथित हृदय को प्रीति मिले।
अवसादित तुम भी पर समर्थ, सुख क्षेम पूछने खुद आई।
रहती थी अंबुद के उर में, बिछुड़ी मोती-सी बिखराई।
हे रूपसि तेरा रूप अमर, मोती-सी विरह में भी सुंदर।
तू प्राणदायिनी गिरकर भी, तुझमें-मुझमें है यह अंतर।
आगमन तेरा मैं धन्य हुई, गुंजित-संगीत एकाकी में।
क्षण को मेरा संताप मिटा, मधु-वन छाया नीरव में।
धन-धाम स्नेह से पूरित हूँ, प्रियजन भी स्वस्थ सुखी सब हैं।
अभ्यास नहीं एकाकी का, प्रिय दूर हुए विरही मन है।
अध्ययन हेतु सेवा से विरत, क्या करूँ यही द्विविधा मन में।
ग्रन्थों को पढ़ती रहती हूँ, पर मन रहता प्रिय चरणों में।
खोली पुस्तक अध्ययन हेतु, है ताप विरह का अंतर में।
प्रिय चिंतन में व्यवधान पड़ें, आँखें नम होतीं तत्क्षण में।
क्या व्यथा कहूँ मैं स्ववश नहीं, मस्तिष्क भी रीता लगता है।
इस हाल में क्या श्रृंगार करूँ, वह धर्म विरुद्ध ही लगता है।
अग्नि को साक्ष्य बना करके,ऐसा ही वचन लिया मैनें।
मन-मंदिर देव नहीं संग में, हूँ शून्य मना, सूनी रैने॥
---- रचयिता-- सर्वानन्द पाण्डेय ' अविज्ञात '
सादर अनुरोध
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बस एक कृपा अब मुझ पर कर दे ,
उर विश्वास अगाध तू भर दे ।
विनत स्वभाव सुमंगल कर दे
सद्विचार जन - जन में भर दे ,
साथ बेढंगों मूर्खों के लग ,
अति बेढब मैं महा मूर्ख हूॅं ।
सिक्ख इसाई जैन पारसी ,
हिन्दू मुस्लिम बना तुर्क हूॅं ।।
हमसब मानव बन संग चल लें ,
प्रेम सुधारस से मन भर लें ।
ऐसी कृपा नियन्ता कर दें ,
बैर भाव सब त्वरित ही हर लें ।
यही कामना मिल सब कर लें ,
कटुता मन का हम सब झर दें ।
सुख दुख में हम साथ निभाएॅं ,
इक दूजे के गुण हम गाएॅं ।।
आपका अपना -- कवि सर्वानन्द पाण्डेय, ' अविज्ञात '
आकांक्षाओं का विशद अतल
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सोचा था मैंने भी एक दिन ,कुछ मीठे स्वर में गाऊॅंगा ।
संकेत दे रहा समय किन्तु , आवाज मात्र कर पाऊॅंगा ।
निस्सीम निखिल ब्रह्माण्ड बीच , कुछ खोजा पर पाया ही नहीं।
जीवन को ध्वनि मैंने भी दिया , अवलम्ब का सुख जाना ही नहीं ।
गाने का सपना चूर हुआ , ये अधर खुले के खुले रहे ।
शायद अनुभव की जलन रही ,अधराधर तो अनजले रहे ।
सरगोशी ऋतु के हलचल का , यह कण्ठ मेरा तो सह न सका ।
कुछ आह भरी चीखें निकलीं , जीवन का गीत सुना न सका ।
सुगन्ध अमर साॅंसों की मेरी , सम्मोहित तुमको कर पाए ।
है साॅंस मेरी पर गन्ध तेरा , उड़कर तुममें ही मिल जाए ।
ना पहुॅंच सका तट तक तो भी , चीखों को स्वर दे दी तूने ।
तट तक जाने के पूर्व टुटीं , सागर - लहरें उर के गाने ।
सागर उर के सन्तापों को , देखा तूने , आशीष दिया ।
अविरल टुटतीं जुटतीं ही रहीं ,आवाज भी तूने सुन ही लिया।
खामोशी वैसी बनी रही , जो कहना था तुम सुन ही लिए ।
तुम बिन सुनने को कौन वहाॅं , सागर उर में आवाज लिए ।
यात्रा वृत्तान्त सुनाने को ,लहरें तट के समीप जातीं ।
झटके पल- पल सहते - सहते खामोशी में ही मिट जातीं ।
शून्य बने आवाज माप , उन्मत्त प्रेम जब होता है ।
आकांक्षाओं का विशद अतल मापित ध्वनि से ना होता है ।।
रचयिता-------- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
उप मुख्य प्रशासक / अटल कवि परिवार
खुद को ही बदल लो 
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हालात जो न बदले , तो खुद को ही बदल लो ।
बस भावना है सुख - दु:ख , निज सोच में दखल दो ।
मन से बीमार जबतक , सुख भी नहीं सुहाए ।
मन ठीक जो रहे तो , गम भी नहीं रुलाए ।
धन की तू भूख छोड़ो , वह शान्त ना कभी हो ।
करुणा दया रहे तो , सुख की नहीं कमी हो ।
कठिनाइयों से खेलो , पुरुषार्थ को जगाए ।
कुछ भी तो ऐसा कर लो , जीवन सफल बनाए ।।
रचयिता ------ सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञात '
उप मुख्य प्रशासक / अटल कवि परिवार
समय तालिका
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क्रियाशीलता ही है जीवन ,
सोलह घंटे नित जीते हम ।
प्रतिदिन घंटा एक बढ़ा लें ,
परोपकार में उसे लगा लें ।।
सोलह घंटे में इक घंटा ,
ईश भजन के नाम करा लें।
मात - पिता गुरुजन की सेवा,
में घंटाभर समय लगा लें ।।
चौदह में दो घंटे अपने ,
खेलें , खाएं मौज मनाएॅं ।
बारह घंटे प्रगति कार्य कर ,
धन वैभव यश खूब कमाएॅं ।।
वय किशोर से साठ बरस तक ,
समय तालिका यह अपनाएॅं ।
यदि ऐसा ना कर सकते तो ,
जाॅंय नरक में , हम पछताएॅं ।।
रचयिता -- सर्वानन्द पाण्डेय ,'अविज्ञात '
क्या बतलाओगी मुझे त्रास ?
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आरूढ़ पवन के झोंके पर ,एक वारिबूंद वातायन से ।
झटके में आकर गालों पर , पूछे अवसाद भरे मन से ।
पल निज वियोग को विस्मृतकर , बोली सस्नेह विरहीअलि से ।
तव गौर वर्ण क्यों श्याम हुआ , देखे क्या निश्चल नयनों से ?
माथे की बिंदिया स्याह पड़ी , हैं नयन युगल बिन काजल के ।
एकाकी में सिमटी हो क्यों , कोमल कर हैं बिन कंगन के ।
था रक्त कपोल गुलाल भरा , आश्चर्य , पड़ा मुर्झाया है ।
मिट गई अधर की अरुणाभा , मस्तक पर सीकन आया है ।
चंचलता नयनों का विलुप्त , स्थिर एकटक क्या देख रही ।
केयूर बन्ध की मोहकता , वह छटा कहाॅं , क्यों मूक बनी ।
वह शोख अदा अन्दाज कहाॅं ,जिसमें रहता था मुक्त हास ।
क्यों कृशकाय होती जाती , बतलाओगी क्या , मुझे त्रास ।
परिजन क्या कोई संकट में , या स्वास्थ्य तुम्हारा ठीक नहीं ।
या स्नेह में ह्रास हुआ प्रिय के , ब्यवहार है या अनुकूल नहीं ।
सुख - दुख दोनो ही साथी हें , आॅंखों में आॅंसू ठीक नहीं ।
मन की बातें इस सखि से बता , तू बिना छुपाए सही - सही ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
सादर नमस्कार आप सभी मनीषियों को ! प्रस्तुत है एक व्यंग रचना ।कृपया इसका आनन्द लें -------- 
किसी तरह से काम निकालो , आगे बढ़ जा भाई ।
अगल - बगल की कुछ ना सोचो , करते रहो कमाई ।
काॅंटे सिर्फ राह के अपने , इधर - उधर कर बढ़ जा ।
साधन की परवाह करो ना , ऊॅंचाई पर चढ़ जा ।
सहयोगी जो रहे तुम्हारें , उनको रौंद कुचल दो ।
आलोचक जो ही हैं तेरे , पहले उन्हें कुफल दो ।
तनिक रहे सन्देह किसी पर , फाॅंस कभी बन जाए ।
झट पकड़ो गर्दन उसकी , वह उभर कभी ना पाए ।
आय प्रतिष्ठा पद जुबान , उसकी जल्दी कर बन्द ।
सम्भव हो तो कर समाप्त , गिन -चुन ऐसे जयचन्द ।
जब कुछ कर सकने की क्षमता , नहीं तुम्हारे पास ।
चुगली अस्त्र अमोघ एक है , जबर्दस्त संत्रास ।
करो खुशामद शक्तिमान का परनिन्दा अपनाई ।
पाओ निजउन्नति का लड्डू , दो बैरी भहराई ।
किसी तरह से करो उगाही , धन संचय कर भाय ।
इतना जिससे सात पुश्त भी , बैठ निठल्ले खाय ।।
-------- रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
उजाला 
‾‾‾‾‾‾‾‾ 
देखा नहीं उजाला 
एक लंबे समय से,
चतुर्दिक व्याप्त घुप्प अंधेरे के कारण,
या देख ही नहीं सका उसे
उपयुक्त दृष्टि के अभाव में
याकि देख ही नहीं सकते उसे
बिना उसकी सहायता के
आँखें रहते हुए भी।
रखा गया दूर, शायद
सायाश मुझे ,
रखने के लिए बरकार अंतर
दृष्टिहीन और द्रष्टा के।
रहते हुए बिना रोशनदान के
तहखाने में भी,
देख ही लेता है मन
छाई हुई बदली को,
सूरज की गर्मी को,
आगामी आँधी को,
और भेदभाव को भी
अन्दर उनके
जिनके लिए क्या कुछ नहीं किया
तथाकथित मूढ श्रमिकों नें।
जबकि
भाव को नफरत और प्यार के
देख लेता है जानवर भी
जिस दृष्टि से,
उससे भी विकसित
तीसरी आँख-- मन की
है उनके पास भी।
रचयिता ------- सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञात '
दिवाली के उजाले में 
‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾‾
अपनों के तो सभी होते हैं,
कभी किसी गैर का भी होकर तो देखो।
पाना-खोना तो जीवन ही है,
कभी अपने अहं को खोकर तो देखो।
कहते हो कि गन्दगी भरा है समाज,
कम से कम अपनी मैल धोकर तो देखो।
सोना-जागना तो लगा हुआ है,
कभी पूरी नींद सोकर तो देखो।
शीतल छूअन तो सबको सुखद है,
कभी अंगोर को टोकर तो देखो।
किसे क्या करना चाहिए का विचार छोड़,
कभी कोई जिम्मेदारी ओढकर तो देखो।
बढती फैलती नफरत के इस दौर में,
प्रेम के धागे में स्वयं को पोकर तो देखो।
भले लोगों की कमी नहीं जमाने में,
इन्सानियत का बीज बोकर तो देखो।
सारा गम गफलत हो जाएगा दिल का,
कभी जीभर रो कर तो देखो।
आपा-धापी में क्या सूरत बना रखे हो,
कभी बिना सपने के सोकर तो देखो।
बहुत कुछ किया सर्वानन्द के लिए,
जो सुकर्म बाकी हैं वो करके तो देखो।
अच्छे से अच्छा साथ सुलभ है धरती पर,
जरा अटल,मंजू,का सानिध्य पाकर तो देखो।
श्रीलक्ष्मी गणेश को तो सभी पूजते हैं,
उर में माँ सरस्वती को बसा कर तो देखो।।
रचयिता---- सर्वानन्द पाण्डेय 'अविज्ञात '
जय धनतेरस
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धनतेरस पर धन बचा , मन पर कसो लगाम ।
धन - रक्षण त्यौहार यह , इसको करो प्रणाम ।।
वर्षा पूरी होत है , भींगे पत्थर नाहिं ।
लोभी मन हो तृप्त ना , बरसे धन जगमाहिं ।।
धनसुख से वंचित रहे , वैरागी मन साधु ।
चाहे जितना भी मिले ,तुष्ट न होत असाधु ।
मन की भूख मिटे नहीं , लाख यतन करि गोय ।
वश में जब यह होत है , मिटे भूख सब कोय ।।
यह विवेक की बात ना , आॅंख सहित हो सूर ।
श्रम कर - कर के धन कमा , इसको करते दूर ।।
लक्ष्मी आदर दिवस यह ,श्रम धन अर्जित लाय ।
कई दिवस अनुमन्य जग , धनतेरस सम भाय ।।
खरचें धन हरगिज नहीं , धनतेरस मन लाय ।
चलो बचाएॅं आज धन , लक्ष्मी तिथि हरषाय ।।
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--- रचयिता ---सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञ '
खजाना
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थोड़ा ही पढ़ो साजन , ब्यवहार भी बनाना ।
छूटे न मैल तो फिर बेकार है नहाना ।
आॅंखें खराब कर ली , घर में बने जनाना ।
पचपन के पार जाकर , स्वयं को क्या सजाना ।।
अब पढ़के क्या करोगे , जो है वही बचाना ।
कानून पढ़के अब क्या , घर लाओगे खजाना ।
है शायरी की धुन अब , नित ही नया तराना ।
हम धन की भूख छोड़ें , पर्याप्त है कमाना ।।
बेकाम मौज करना , अच्छा तेरा बहाना ।
बच्चों की भी तो सोचो , कर दो शुरूपढ़ाना ।
बिगड़ेंगे सारे बच्चे , होगा हमें लजाना ।
गुर कामयाबी के तो , इनको भी कुछ बताना ।।
आचरण यदि नहीं तो , कविता है क्या बनाना ।
करुणा दया भी सीखो , किसी को ना सताना ।
ठगना नहीं किसी को , सन्तोष है खजाना ।
कविता सुनाके मुझको हरगिज नहीं पकाना ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाणडेय ' अविज्ञात '
विश्व खाद्य दिवस 
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धन सम्पति सब व्यर्थ है , बिना अन्न भण्डार ।
रत्न शान्त ना कर सके , जठरानल टंकार ।।
उत्पादन हो अन्न का , संरक्षण अनुकूल ।
बर्बादी पर रोक हो , ऊपेक्षा प्रतिकूल ।।
कृषकों का सम्मान हो , उन्नत खाद व बीज ।
कृषि ऋृण वितरण हो सरल , दूर हो उनकी खीज ।।
भरी धरा हो अन्न से वितरण मे ना खोट ।
अपमिश्रण पर रोक हो , जमाखोर को चोट ।।
वैज्ञानिक विधि से करें , भण्डारन का योग ।
कृषि कौशल विकसित करें,शिक्षण का उपयोग ।।
दाने कुछ ही काट कर , दुरुपयोग पर रोक ।
भूखों का पोषण करें , मिटा दें उनका शोक ।।
सरकारी सहयोग की , अहम भूमिका मान ।
सजग रहे हर नागरिक , भारत बनें महान ।।
कमी अन्न की ना रहे , संरक्षण ही विकल्प ।
विश्व खाद्यान्न दिवस पर , भण्डारन संकल्प ।।
रचयिता ---- सरवानन्द पाण्डेय 'अविज्ञ'
शरद ऋतु
____________
शरद ऋतु घनघोर वारिस , कठिन गृह से वहिर्गमन ।
ठिठुरन भरी ठंडी ,सजन से , लिपटने की है लगन । 
सर्द ठंडा पवन रतिश्रम , की थकान मिटा रहा ।
कठिन दिन भी मौज में संग सुन्दरी के बिता रहा ।।
लास्य में उन्मुक्त नारी , प्यार पाने के लिए ।
संलग्न जिस भी कर्म में , प्रिय को रिझाने के लिए ।
सामर्थ्य उसको रोक पाने , का किसी में है नहीं ।
ब्रह्मा भी प्रेमोद्योग से , उसको डिगा सकते नहीं ।।
सर्वानन्द पाण्डेय " अविज्ञात "
ताका-झॉंकी , बेमतलब की 
गोप्य जगह की , बिना सबब
छिद्र बढ़ा कर , बेपर्दा कर 
इसे तुरत ही बन्द करें ।
सोच-समझ सब , ऊॅंच-नीच की 
जाति-धर्म की बिना सबब
खान्दानी बन नीच कर्म कर
इसे तुरत ही बन्द करें ।
जिम्मेदारी कर के विस्मृत
लापरवाही बिना सबब
हो अपमानित बन कर निन्दित
इसे तुरत ही बन्द करें ।
करना खारिज क्षमा शब्द को
शब्दकोष से बिना सबब
डॉंट-डपट को निरर्थक कह
इसे तुरत ही बन्द करें ।
ताक पे रखकर कानूनों को
दोषारोपण बिना सबब
हतप्रभ करके कार्यकुशल को
इसे तुरत ही बन्द करें ।
बिना दोष के अधीनस्थ को
दण्डित करना बिना सबब
लात मारकर पेट पे उनके
इसे तुरत ही बन्द करें ।
--- सर्वानन्द पाण्डेय " अविज्ञात "
प्रेम : एक जैव संगीत
---------------------------
साथ प्रिय का
कहे - अनकहे
होता प्रियतम का 
जीवन संगीत ।
पाकर साथी का साथ
चाहे अनचाहे
आॅंखों ही आॅंखों में
होता संवाद
जो प्रिय प्रियतम दोनों के
सुप्त संवेदी
तन्तुओं को करता अवश्य
झंकृत ।
उत्पन्न मूक हलचल
नीरव मन में ,
सुने अनसुने
उस जैव झंकार से
बन जाता
एक मधुर संगीत ।
सुर तरंगों का
स्वाभाविक रूपायन ,
दिखे - अनदिखे
वाह्य नेत्रों से ,
पर हो जाता आगोशित ,
साथी मनमीत ।
एक तड़ित उद्दीपन ,
उस अदृश्य रूपायन के
सुलभ आकर्शण से ,
होता मन में
संचरित ।
सहज संस्पर्श
एक दूजे का
छू लेता मन को
करता हुआ
जैव - उष्मा - विनिमय - परिपथ
सम्पूरित ।
होता सुखद उद्रेक
रतिभाव का ,
उस उष्मा संचरण से ,
करता समस्त परिताप
विगलित ।
रति अणुओं के
प्रवाह मान नाभिकीय संलयन से
होता परमानन्द
स्रवित ।
परमानन्द के रिसाव से ,
अभिसिंचित मन प्राण में ,
अजस्र अनुराग होता
प्रस्फुटित ।
इन्द्रियातीत रूप में
कानों को भी दिखाई
और आॅंखों को भी सुनाई
देने वाला वह अनुराग
शरीर के रोम - रोम से होता
अनुभूत ।
उस प्रेमावृत्त परिस्थिति में
एक मूक संगीत के
छन्दमुक्त लय
और प्रकृति के ताल में
अद्वितीय जीवनीशक्ति होती
सन्निहित ।
वह जीवनी शक्ति
अपनी पूरी लय - ताल
और मनोरम स्वर से
रखती सृष्टि चक्र को
सतत गतिशील ।
गतिशीलता का
उन्मेश है प्रकृति
तो उसकी झंकृति
मानव का
इतिहास धर्म
सभ्यता और संस्कृति ।
सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञ '
शंकर जाप किए जाता हूॅं
---------------------------
सुखद स्मृतियाॅं भी अतीत की , आज न मन को सहला पाएॅं ।
साधन भोग प्राप्त जो मुझको ,वे भी मन ना बहला पाएॅं ।
अपनों से यह दर्द मिला है , या चाहत मुझको दहलाएॅं ।
पता नहीं क्यों रो -रो करके , गम को तीब्र किए जाता हूॅं ।
शंकर जाप किए जाता हूॅं ।।
यही लोक संसार यही है , सुख दु:ख में तो सकल मही है ।
अल्प ज्ञान से मुझे न मालूम , क्या मिथ्या क्या उचित सही है ।
अनुचित उचित बताने वाला ,जब मुझमें अभिज्ञान नहीं है ।
तब क्यों सब कुछ निज मर्जी से , घटना -होना बतलाता हूॅं ?
शंकर जाप किए जाता हूॅं ।।
लचर पैरवी
-------------
बड़े-बड़ों पर तो नहीं , भ्रष्टाचार से रोक ।
अनुमति मिले न केस की , निर्भय छल बेटोक ।।
सभी जानते हैं नहीं ,जानें जो वे मौन ।
जानकार तो स्वार्थी , बोलेगा तब कौन।।
सदा निरंकुश ये रहें ,आवे जो सरकार ।
कर्त्ता-धर्त्ता ये बनें ,शासन की दरकार ।।
दर्ज कभी जो केस भी , लचर पैरवी लाय ।
बच जाते हैं भ्रष्ट भी , साक्षी को धमकाय ।।
भ्रष्ट आचरण फले -बढ़े ,मिली-भगत तकनीक ।
इनकी बातों की करे , पुलिस सदा तसदीक ।।
आज लगाई कोर्ट ने , भी जमकर फटकार ।
अधिनियम का दुरूपयोग , करती है सरकार ।।
उलटा सिर क्लाडिओ
------------------------
उलटे सिर से भी जिए ,आवासी ब्राजील ।
मोन्टे सान्टो शहर है ,श्रेष्ठों में तामील ।।
नाम क्लाडिओ विएरा ,मातु मारिया जोस ।
जिजीविषा असीम है ,भरा हुआ है जोश ।।
हाथ पैर नाकाम हैं ,जन्मजात ये पंगु ।
इच्छा शक्ति जीवन्तता ,तो इनके हैं झंडु ।।
उलटा सिर जीवन सरल ,इनका अनुकरणीय ।
मन के सबल हैं क्लाडिओ ,वक्ता आदरणीय ।।
स्नातक लेखा विषय में ,मुॅंह में कलम दबाय ।
आश्चर्य घनघोर है ,माउस ओठ चलाय ।।
ठीक अंग जिनके सभी उन्हें चुनौती भाय ।
क्लाडिओ से सीख लें , इच्छा शक्ति जगाय ।।
धन्य क्लाडिओ पुत्र तुम ,माता जोस भी धन्य ।
जियो युगों तक मित्र तुम ,कौशल तव अनुमन्य ।।
आदमी सर्वजेता
-------------------
जंगल के राजा ने
जंजीर में जकडे बलशाली हाथी से
गर्मशलाका से दागे गए प्रचण्ड साॅड से,
और कान कटे बलिष्ठ भैंसे से,
पूछ कर जाना कि
उनकी वैसी दुर्दशा आदमी ने किया।
तब चल पड़ा वह आदमी की तलाश में।
फिर जड़ से कटे भू लेटे
एक विशालकाय वृक्ष को देखा।
उसके मोटे तने को
आरा से टुकड़े करते हुए
लोगों के पास पहुँचा।।
शेर को देख वे दहल गए।
क्षतिकारित न करने का
उन्हें आश्वासन देकर
शेर ने पूछा-
पेड़ की वैसी हालत किसने की?
उत्तर मिला-
आदमी ने।
शेर ने आदमी दिखाने का
उनसे आग्रह किया।
भयभीत आरा वालों ने शेर से कहा-
पहे अपना पंजा वह
लकड़ी की फाँक में लगावे।
ताकि आरा निकालकर आराम से
उसे आदमी दिखाया जा सके।
उत्सुक वनराज के वैसा करते ही
उसका पंज
लकड़ी की दराज में फँस गया।
दर्द से बिलबिलाते शेर ने
आदमी दिखाने की उनसे मिन्नत की।
तब बेफिक्र हो चुके लोगों ने
उसे सगर्व बताया कि
वे ही हैं - आदमी - सर्वजेता
जिन्होंने वनराज को भी फँसाया।
--रचयिता----सर्वानन्द पाण्डेय,' अविज्ञात '
रूप सरस पीए जाता हूॅं
नग्न बदन लगता अति सुंदर ।
चित्र उकेरे गजब पुरंदर ।
चोर दृष्टि से बच नजरों से ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं ।।
प्रश्न करे जो,मन का खोटा ।
बेदिल वह दिमाग का मोटा ।
मैं तो कुदरत की सुंदरता ।
अंतरतर में लिए जाता हूॅं ।।
अंग-अंग से प्रेम टपकता ।
दाता का ही भाव झलकता ।
प्रकट लास्य के गीत रसीले ।
सतत सदा गाए जाता हूॅं ।
गंदे मेरे भाव जो माने ।
अपनी राह चलें मन माने ।
बेफिक्री बेलौस बात को ।
निर्भय प्रकट किए जाता हूॅं ।
ईश्वर की रचना न्यारी है ।
ढँको नहीं यह तो प्यारी है ।
इस पर ही अवलंबित रहकर ।
मैं जीवन जीए जाता हूँ ।।
अब से भी तो सुधरें
---------------------
ठीक सुबह ही जागकर , मंजन , शौच स्नान ।
घर विस्तर मन साफ कर , करें ईश का ध्यान ।।
प्रति दिन निश्चित समय पर , लेवें अल्पाहार ।
छह घंटे के अन्तराल , पर दिन का आहार ।।
नीम दातवन जो करे , प्रति दिन खूब चबाय।
आधे घ्टे टहलकर , सूगर से बच जाय ।।
रोटी आधी काटकर , सब्जी दाल सलाद ।
तेल मसाला नमक कम , मीठा हो अपवाद ।।
दुम दुबकाए भागता , गीदड़ पाकिस्तान । शेरे दिल है झपटता उस पर हिनदुस्तान ।उस पर हिन्दुस्तान ,गड़ाए अपना पंजा । पिद्दीभर औकात ,और आतंकी धंधा ?कहते सर्वानन्द ,अगर ना माने पाजी । चट कर देंगे साफ , बनाकर तुमको भाजी ।
इंजीनियर
------------
देखा एक इंजीनियर ,सुगरमील प्राइवेट ।
सूट- बूट कालिख सना कसा हुआ था बेल्ट ।।
स्वयं हाथ में रिंच ले , कसता दिखा मशीन ।
वाह! मुख्य इंजीनियर , निष्ठा गजब हसीन ।।
सरकारी इंजीनियर , साहब की औलाद ।
हस्ताक्षर केवल करें , छूएॅं ना फौलाद।।
ठाट बाट देखे बने , मोटा मिले पगार ।
अच्छे दिन क्या आएंगे , बिकने के कागार ।।
ऐसे ही सेवक सभी , जब मेहनत से दूर ।
देश तरक्की क्या करे , जब सेवक मगरूर ।।
साहब आफिस में रहें , बाहर कुछ भी होय ।
जिम्मेदारी से बचें , चादर ओढ़े सोय ।।
सोशल साइट्स
-------------------
सोशल साइट से बढे तेजी से अपराध।
डॉस बार से फैलता, है तलाक अवसाद ॥
हिंसक गतिविधियॉ बढ़ीं नारी का अपमान।
उत्पीड़न भी बड़ रहा गिरा शील प्रतिमान॥
अश्लीलता का करे,इंटरनेट व्यापार।
सरकारें साझी बनीं, फैल रहा व्यभिचार॥
माहाराष्ट्र सरकार की गठित समिति की रिपोर्ट।
न्यायमूर्ति अध्यक्ष थे , संज्ञान ले कोर्ट ॥
अन्यथा दब जाएगी,कैबिनेट की बात।
अच्छे दिन ना अाएंगे,बनी रहेगी रात॥
न्यायमूर्ति की समिति ने कहा रोकअविलम्ब।
चुप तब क्यों सरकार है,करे तनिक न विलम्ब॥
परिभाषक अब श्लील के ,अाते नजर उदार।
लगता पश्चिम से लिए , वे यह सोच उधार॥😈😒
चले मिटाने देश से , वे ही भ्रष्टाचार।
सेंसर बोर्ड में बैठकर करते अत्याचार॥😈
अश्लील संवाद पद ,
बच्चे मन के सच्चे 
----------------------- 
नहीं छिपाते दुर्गुण अपने , 
दुर्गुण अपने नहीं छिपाते ।
पिटते रहते डाॅंटे जाते , 
डाॅंट जाते रोज पिटाते ।
कह जाते हैं गलती अपनी ,
गलती अपनी कहते जाते ।
दुहराते हैं बड़ों की करनी ,
बड़ों की करनी ही दुहराते।
नहीं अलग है बस्ती इनकी ,
बस्ती इनकी अलग नहीं है ।
तुमसे हमसे उनसे सबसे ,
स्रोत ज्ञान का अलग नहीं है ।
बच्चों को हम ही सिखलाते ,
सिखलाते बच्चों को हम ही।
खोना पाना रोना हॅंसना ,
कहना सहना ऐंठ क्रोध भी ।
खेलें खाएॅं पूछ माॅंगकर ,
पूछ माॅंगकर खेलें खाएॅं ।
स्वाभाविक चंचलता पर हम ,
प्यार भुलाकर क्रोध दिखाएॅं ।
इनके मन में भेद नहीं है ,
नहीं भेद है मन में इनके ।
जाति धर्म और ऊॅंच -नीच का
भरें भेद हम मन में इनके ।
खूब कोसते मात - पिता को ,
मात - पिता को खूब कोसते ।
आपस में जब बच्चे सारे
भेद जान भी भेद न पाते ।
अपने ही बच्चें की सोचो ,
सोचो अपने गी बच्चों की ।
जहर न घोलो मन में इनके ,
ऊॅंच नीच और जाति धर्म की ।
आपस में जो मारकाट है ,
मारकाट जो है आपस की ।
रहे झेलते दंश ये बच्चे,
सोच तनिक इनके त्रासद की ।
रचयिता--- सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
डोरी
------
हमको पतंग की तो दिखती नहींं है डोरी ।
इस मन मतंग की तो अदृश्य शक्ति कोई ।
अज्ञात रूप में ही इसका खिंचाव जारी ।
अदृश्य डोर से ही चलती है दुनियादारी ।
उन्मुक्त आसमां में ऊॅंचाइयाॅं भी छू लें ।
देवत्व भी वरण हो मनुष्यता न भूलें ।
श्रेष्ठता मिले तो फिर श्रेष्ठतम को चूमें।
सबको ही साथ लेकर मनुष्यता मेंं झूमें ।
अभ्युदये क्षमा हो मदान्धता है भोरी ।
भूलें न हों किसी से यह कल्पना है कोरी ।।
रचयिता------ सर्वानन्द पाण्डेय ,अविज्ञात ।
प्रकृति ,पर्यावरण और मनुष्य 
-----------------------------------
प्रकृति और समस्त प्रकृत तत्वों को
देवी - देवताओं और परम पिता को भी
निजस्वार्थ में दोहन योग्य मानकर 
इनके परम हितैशी स्वभाव को आहतकर
अपने और अपनों के त्वरित भोग के लिए
स्वार्थान्धी मनुष्य चलाता है ।
पर्यावरण को ही नहीं
अपितु पृथ्वी को भी क्षत वक्षत करके
इसके वृक्षों वनों को काटकर
जलाशयों को घेरऔर पाटकर
पहाड़ोंको घनी बस्ती बसाकर
अन्तरिक्ष को भी अधिकाधिक व्यस्तकर‍
और पृथ्वी को हिरोशिमा बनाकर
आदमी चलाता है ।
नानाविध प्रदूषण से
प्रकाश संश्लेषण की
अनिवार्यत:आवश्यक जैविक प्रक्रियाको
अनवरत रूप में अवरोधित कर
जीवनाधार भोज्य - पेय पदार्थों को
अपशिष्ट करके
कुपोषण का शिकारबन
आदमी चलाता है ।
कम्प्यूटर और मोबाइल फोनका
अपने चारों ओर संजाल बनाकर
जानलेवा इलेक्ट्रो मैग्नेटिकक्षेत्र सृजित कर
फैक्ट्रियों के माध्यम से
और परमाणु भट्ठियों से
जल - थल - वायु में कचरे डालकर
असाध्य बीमारियों के कारक
रेडियोऐक्टिव अवशिष्ट उत्सर्जित कर
पूरी प्रकृति के हितैषी स्वरूप को
आदमी बिगाड़ता है ।
रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर चलाकर
जहरीली गैसैं पैदा करके
ओजोन स्तर को विदीर्ण कर
अनावश्यक आग जलाकर
पृथ्वी का तापमान बढ़ाकर
ग्लेशियरों को पिघला कर
और ऋतुचक्र को अव्यवस्थित करके
सूखा, बाढ़ तथाठंड का प्रकोप बढ़ाकर
अका मृत्यु की ओर
आदमी स्वयं को चलाता है ।
अनियंत्रित रूप में जनसंख्या बढ़ाकर
आवश्यक खाली जगह को घेरकर
निर्विकार शान्त मन में भी
कोलैप्स हो जाने तक
तीब्रतम हलचल पैदा कर ,
अपशब्दों से मनों में
कभी न बुझने लाली आग लगाकर
पृथ्वी के पर्यावरण को
अनेकविध प्रदूषणों से सान्द्रित कर
पूरी पृथ्वी के अस्तित्व को
जलजले( प्रलय ) की राह पर
सर्वाधिक विवेकशील , मतंग मनुष्य
गर्वोन्मत्त होकर चलाता है ।
--- रचयिता ----- सर्वानन्द पाण्डेय ' अविज्ञात ' ।
मेरे लोग और मैं 
-------------------
जब देखता हूॅं लोगों को
घर में और दहलीज के बाहर
देहली तक और
मीडिया के माध्यम से
पूरी दुनियाॅं तक ,
सरल , संयत , संयमी,
सौम्य ,श्रमशीलऔर सदाचारी,
तब बिछ जाना चाहता हूॅं
कदमों में उनके ।
न पाकर इन गुणों को स्वयं में
मेरा मैं
दिखता है मय मात्र,
इतराता फिरता हूॅं जिससे
मैं ,नारद मोह में ।
इन गुणों के अभाव में
मेरे सभी अपने
लगते हैं मरे - से ।
यथार्थबोध के उन क्षणों में
मेरा मान - सम्मान ,
अभिमान और स्वाभिमान
होने लगता है विगलित
सम्पूर्ण रूप में ।
वैसी मनोस्थिति मेंभी
पाताहूॅं आश्वस्त
स्वयं को मैं
कि शेष है विचार बोध
अन्तस् में मेरे अभी
अच्छे -बुरे का ।
फिर लेता हूॅं संकल्प
मन में बार - बार
बन जाने के लिए उन्हीं जैसा
पर यह शुभ विचार
होता रहता है तिरोहित
भोग के धुएॅं में ।
माने बिना हार
नहीं बन्द किया हूॅं सोचना अभी
कि कर सकता हूॅं आत्मसात
इन मानवीय गुणों को
स्वयं में
यदि चाहूॅं तो
क्योंकि हूॅं तो मैंभी
एक अदद आदमी ही
उन्हीं के जैसा ।
रचयिता---- सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञात '
मेरा जीवन
-------------
बचपन बीता यौवन आया ,
जिम्मेदारी बढ़ती ही गई।
अपने में सिमट कर बैठा था ,
अपनों की चिन्ता छा ही गई ।
कुछ वर्षों तक मेरा बचपन ,
था लाड़ - प्यार में पला मगर,
रह - रह कर कुछ झटके आए ,
कठिनाई की मिल गई डगर ।
पढ़ने में मैंथा सजग नहीं ,
फिर इश्क की रंगत रही चढ़ी ।
गिरते - पड़ते बढ़ता भी गया ,
दुर्भाग्य रही सामने खड़ी ।
बैठे नाहर - सा मैंने तो ,
श्रम किया नहीं कामना रहा ,
मास्टर भी बना नौकरी मिली ,
पढ़ने - लिखने से मन न भरा ।
पत्नी आई परिवार बसा ,
अध्ययन दख अरमान जगा ।
पढ़ने को अब अवकाश नहीं ,
कविता के प्रति सम्मान जगा ।
जब समय, चाह था,अर्थ नहीं ,
पैसा अब है तो समय नहीं ।
तब भी अभाव था ,अब भी है ,
चंचलता मन का गया नहीं ।
वर्षा आने से पूर्व सुखा ,
मन का उद्यान वीरान बना।
पढ़ - लिखकर ऐसा लगता है ,
जीवन ही एक वितान बना ।
अब तो स्वयं ही पछताता ,
मन का गुब्बारा फूट गया ।
अपनी ही करनी के कारण ,
जीवन ही मेरा लूट गया ।
बीवी की ही अब आस लगी ,
अपने मन को भरमाया हूॅं ।
यौवन की मस्ती कम करके ,
पढ़ने पर उसे लगाया हूॅं ।
है दो साल की नौकरी ,
औ खुशामदी का यह आलम ।
जब चाहो तो अवकाश नहीं ,
झूठा भरना है हर कालम ।
अब ईश्वर से ही निवेदन है ,
रोटी की अन्य व्यवस्था दो ।
इस तीन - पाॅंच से पिण्ड छुटे ,
कर पाक तू शेष अवस्था को ।
--- रचयिता -- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात ' ।
चमत्कार
-----------
दो शिला खण्डों में
सजातीय बन्दों में
अनमनी वार्ताहो रहीअविराम ।
क्योंकर है एक पद दलित
तो दूसरा नयनाभिराम ?
हैं दोनों पाहन
पर एक बना आसन
तो दूसरे के लिए
सजा सिंहासन ।
पूछने पर पहले के
दूसरा बतलाता है
दर्शनीय होने का
कारण समझाता है ।
काटकर कठोरता से
मातृ शिलाखण्ड से
दिए गए चोट अनगिनत उसे
छेनी और हथौड़े से ।
सुना देखा था
सजीव को काट - पीटकर
मृत बना देना
पर आश्चर्य सुखद
करके यही एक पाषाण को
युगों - युगों के लिए
अमर्त्य बना देना ।
देकर शिल्पी ने चोट चतुर्दिक
छेनी और हथौड़ी से
किया अतिशय रूपायित उसे
काट - छाॅंटकर बेरहमी से ।
पूर्ण समर्पण से खाते हुए
चुपचाप चोट
मिट गए उसके
सारे वाह्यान्तर खोट ।
अपने कलात्मक करों से
मूर्तिकार ने
बनाया उसे कमनीय ,
और रचनात्मक मेधा से
सर्वप्रिय तथा दर्शनीय ।
इसप्रकार जो
बचा रहा चोट से
वह बना रहा
दयनीय ।
रचयिता --- सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञात '
चलते हरते चीर 
----------------- 
आतंक से न्यून नहीं , प्रेम का बढ़ता रोग ।
दोनों कोढ़ समाज के ,यह विनाश का योग ।।
आतंकी अत्यल्प हैं , प्रेमोन्मादी दीर्घ ।
पार्क ,माल ,होटल बने , दोनों के ही तीर्थ ।।
दोनों उर्जावान पर , अक्लमन्द , नाधीर ।
देव -अप्सरा भोग में , खून को समझें नीर ।।
मर्यादा का ध्यान ना ,चलते हरते चीर ।
जहर न अन्दर का दिखे ,ऊपर देखें खीर ।।
ज्ञानीजन अति प्रौढ़ भी , इनके हैं उस्ताद ।
नेता ,वैज्ञानिक बनें ,प्रोफेसर गुस्ताख ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '