खजाना
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थोड़ा ही पढ़ो साजन , ब्यवहार भी बनाना ।
छूटे न मैल तो फिर बेकार है नहाना ।
आॅंखें खराब कर ली , घर में बने जनाना ।
पचपन के पार जाकर , स्वयं को क्या सजाना ।।
अब पढ़के क्या करोगे , जो है वही बचाना ।
कानून पढ़के अब क्या , घर लाओगे खजाना ।
है शायरी की धुन अब , नित ही नया तराना ।
हम धन की भूख छोड़ें , पर्याप्त है कमाना ।।
बेकाम मौज करना , अच्छा तेरा बहाना ।
बच्चों की भी तो सोचो , कर दो शुरूपढ़ाना ।
बिगड़ेंगे सारे बच्चे , होगा हमें लजाना ।
गुर कामयाबी के तो , इनको भी कुछ बताना ।।
आचरण यदि नहीं तो , कविता है क्या बनाना ।
करुणा दया भी सीखो , किसी को ना सताना ।
ठगना नहीं किसी को , सन्तोष है खजाना ।
कविता सुनाके मुझको हरगिज नहीं पकाना ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाणडेय ' अविज्ञात '
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थोड़ा ही पढ़ो साजन , ब्यवहार भी बनाना ।
छूटे न मैल तो फिर बेकार है नहाना ।
आॅंखें खराब कर ली , घर में बने जनाना ।
पचपन के पार जाकर , स्वयं को क्या सजाना ।।
अब पढ़के क्या करोगे , जो है वही बचाना ।
कानून पढ़के अब क्या , घर लाओगे खजाना ।
है शायरी की धुन अब , नित ही नया तराना ।
हम धन की भूख छोड़ें , पर्याप्त है कमाना ।।
बेकाम मौज करना , अच्छा तेरा बहाना ।
बच्चों की भी तो सोचो , कर दो शुरूपढ़ाना ।
बिगड़ेंगे सारे बच्चे , होगा हमें लजाना ।
गुर कामयाबी के तो , इनको भी कुछ बताना ।।
आचरण यदि नहीं तो , कविता है क्या बनाना ।
करुणा दया भी सीखो , किसी को ना सताना ।
ठगना नहीं किसी को , सन्तोष है खजाना ।
कविता सुनाके मुझको हरगिज नहीं पकाना ।।
रचयिता ---- सर्वानन्द पाणडेय ' अविज्ञात '
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