ज्वाला वृद्धि प्रचण्ड
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तपती भट्ठी पास में तपन न फिर भी होय ।
प्रकृति , ज्ञान , विज्ञान को ,झूठ करें सब कोय ।।
वह कोठे पर बैठती , करती गरमी ठंड ।
रूपसियाॅं अस सज चलें , ज्वाला वृदधि प्रचण्ड ।।
सजना सजना के लिए ,देता सम्यक अर्थ ।
नगरबधू फीकी पड़ी ,ये सज करें अनर्थ ।।
अंग दिखाकर मोहना ,मन में करना पैठ ।
मन माफिक हित साधना , छोड़ बनो कुलश्रेष्ठ ।।
झीने कपड़े , न्यून भी ,धारण करके तंग ।
बनी हीरोइन ये फिरें , इनके उनके संग ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
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तपती भट्ठी पास में तपन न फिर भी होय ।
प्रकृति , ज्ञान , विज्ञान को ,झूठ करें सब कोय ।।
वह कोठे पर बैठती , करती गरमी ठंड ।
रूपसियाॅं अस सज चलें , ज्वाला वृदधि प्रचण्ड ।।
सजना सजना के लिए ,देता सम्यक अर्थ ।
नगरबधू फीकी पड़ी ,ये सज करें अनर्थ ।।
अंग दिखाकर मोहना ,मन में करना पैठ ।
मन माफिक हित साधना , छोड़ बनो कुलश्रेष्ठ ।।
झीने कपड़े , न्यून भी ,धारण करके तंग ।
बनी हीरोइन ये फिरें , इनके उनके संग ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
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