कथित प्रेम
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जपे न माला प्रेम की , सबसे सद्व्यवहार ।
सरल शान्त जीवन श्रमिक कर्मनिष्ठ व्यापार ।।
कामचोर जो आलसी ,खाली मन शैतान ।
कामभोग में व्यस्त वे , गिद्धदृष्टि हैवान ।।
उच्च घरों के शोहदे , कामुक प्रेम पिपासु ।
रोटी की चिन्ता नहीं , कामशास्त्र जिज्ञासु ।।
असन्तुष्ट स्वभाव से ,अनैतिक जो नारि ।
भोगलालसा में फॅंसें , धन पर जातीं वारि ।।
यत् देखो तत् पाइयो , मजे की है अतिवृष्टि ।
कथित प्रेम की दृष्टि है इसी से चलती सृष्टि ।।
रचयिता --- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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जपे न माला प्रेम की , सबसे सद्व्यवहार ।
सरल शान्त जीवन श्रमिक कर्मनिष्ठ व्यापार ।।
कामचोर जो आलसी ,खाली मन शैतान ।
कामभोग में व्यस्त वे , गिद्धदृष्टि हैवान ।।
उच्च घरों के शोहदे , कामुक प्रेम पिपासु ।
रोटी की चिन्ता नहीं , कामशास्त्र जिज्ञासु ।।
असन्तुष्ट स्वभाव से ,अनैतिक जो नारि ।
भोगलालसा में फॅंसें , धन पर जातीं वारि ।।
यत् देखो तत् पाइयो , मजे की है अतिवृष्टि ।
कथित प्रेम की दृष्टि है इसी से चलती सृष्टि ।।
रचयिता --- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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