रविवार, 31 जनवरी 2016

प्रणमामि परमेश्वरी

नमस्तुभ्यम् साध्वी , भवप्रीता ,
आद्या , आर्या ,महातपा: ।
दुर्गा , त्रिनेत्रा , चण्डघण्टेति ,
भव्या , भाव्या , महाबला: ।।
सती , भवानी ,अहंकारा ,
चित्तरूपा , चिता , चिति: ।
सत्ता , चित्रा , मन , बुद्धि: ,
प्रणमामि परमेश्वरी !!
--- सर्वानन्द ।

जय माॅं

अंगकान्ति तो जगदम्बा की ,‍
सूर्य सहस्त्र समान हैै ।
उर पर मुण्डमाल अतिशोभित ,,
रक्ताम्बर द्युतिमान है ।।
स्तनद्वय चन्दन से लेपित ,
मुख मोहक अभिराम है ।
तीन नेत्र‍ त्रिभुवन की माया ,
चन्द्र मुकुट तो ललाम हैै ।।
जपमालिका , विद्या कर से ,
अभया का वरदान हैै ।
कमलासन तिष्ठित देवी को ,
बारम्बार प्रणाम है ।।
---कवि सर्वाानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्यनियंत्रक , पूर्वोत्तररेलवे वाराणसी ।

नमो मतङ्गमुनिपूजिता

नमो शाम्भवी देवमाता ,
मातङ्गी , सुरसुन्दरी ।
अनेकवर्णा चामुण्डा ,
ब्राह्मी ऐन्द्री माहेश्वरी।।
स्रर्वशास्त्रमयी सत्या ,
नित्या बहुला उत्कर्षिणी ।
दक्षकन्या बहुलप्रेमा ,
अमेयविक्रमा शूलधारिणी ।।
सदागति: विमला ज्ञाना ,
वाराही सुरपूजिता ।
कात्यायनी भद्रकाली ,
नमो मतङ्गमुनिपूजिता ।।
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

मन सहज ही मदान्ध हो

दूधिया - सा धवल भवन ,
समु्ज्ज्वला हो चन्द्रिका ।
पति परायण प्रेयसी ,
नीरज नयन मुख मल्लिका ।
सुगन्धमय वातावरण भी ,
पुष्प चन्दन गन्ध हो ।
यदि विरागी जन नहीं तो ,
मन सहज ही मदान्ध हो ।।
--- कवि सर्वानन्द पाणेडेय ,अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूरर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

माँ दुर्गा

कौमारी क्रिया नित्या ,
युवती प्रौढा बलप्रदा ।
मु्क्तकेशी घोररूूपाश्च,
नमो यति: नारायणी ।।
अनन्ता रौद्रमुखी क्रूूरा ,
सावित्री ब्रह्मवादिनी ।
प्रत्यक्षा एककन्याश्च ,
सर्वासुरविनाशिनी नम: ।।
---- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

मित्रता / सन्मित्रता

हो परख तब मैत्री कहाॅं ? 
क्यों मित्रता की परख हो ? 
क्यों पुरुष बाहर परख से? 
नर-नारि मेंं क्यों फरक हो ??
यह मित्र‍ता तो फरेेब है ,
धोखाधड़ी की पोटली ।
करते चयन से मित्र‍ता ,
यह बात कितनी खोखली ?
मनमाफिक को मित्र‍ बनाले ,
नापसन्द को दूर हटा ।
सुन्दर कपड़े धारण कर लेंं ,
दूर हटा दें कटा - फटा ।।
पूर्ण स्वार्थमय संसार मे ,
सभी मित्र‍ रिपु कोई नहीं।
जीव - जन्तु सभी जड़ जंगम ,
व्योम वायु जल अ्ग्नि मही ।।
सद्विचार कुविचार मित्र अरि ,
अन्दर सबके बैैठे हैं ।
लोक आचरण अपने देखें ,
सबके संग हम कैसे हैं ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

हूर भी नाखास है

तीरगी जो दिल में हो 
तो नूर सब नाकाम है ।
जज्बात जो गन्देे हुए ,
तो हूर भी नाखास है ।।
हर हेमेशा इ्ल्म हर ,
नीचा दिखाना गर रहा ।
हासिल न होगी चीज वह ,
जिसकी मुकम्मल हुनर है ।।


जब कभी अवसर मिला ,
धर्मानुरागी विज्ञ भी।
नैकट्य नारी से हुआ ,
आसक्त दृढ़ प्रतिज्ञ भी ।
कमलनयन सुडौल जंघे, 

करधनी मणिरतन की ।
हो सुलभ सहमत सुन्दरी,

इच्छा सहज ही रमण की ।।
हर कोई रावण नहीं है ,
-------------------------
रावणी सेना चतुर्दिक ,काम से पहचान आते ।
पारखी की ना जरूरत , बालमन भी जान जाते ।
रावणी दुष्कर्म से , जो ही कभी ना बाज आते ।
लोकहित के शत्रु जो ,सब आसुरी कौशल दिखाते ।
दान श्रम से दूर पर , जो दूसरों की लूट खाते ।
वर्जनाओं को न मानें , क्षमा को कायर बताते ।
धूर्तता छल खूब करके , भोग के साधन जुटाते ।
द्वेष - ईर्ष्या बेईमानी , दंश के हैं गीत गाते ।
परपुरुष परनारि पर ,षडयंत्र से जादू चलाते ।
गलतियों पर शर्म ना ,पर दूसरों के सिर झुकाते ।
रावणी सैनिक सभी ये , मूर्ख हैं चाबुक चलाते ।।
इनमें भरें उत्साह जो , वे शक्ति से सबको चराते ।
उच्च पद पर बैठकर , हर कार्य अपना साध जाते ।
एम पी बनें जिनसे एम एल ए शासकों को भी नचाते ।
सबकी जुबां पे नाम हैं ,पर बेबशी सब ही दिखाते ।
बेवक्त तो रावण यही , अधिकांश जन के काम आते ।
अब तो पासा ही उलट , सीधे चुनाव में कूद जाते ।
धन - बाहु के बलवान ये , इनसे नहीं हम पार पाते ।
तृष्णा अनेक लिए सभी , भगवान अब अवतार पाते ।।
---- सर्वानन्द पाण्डेय , " अविज्ञात
मेरी रावणी वृत्ति , इसे बढ़ावा देनेे वालों को सग्लानि समर्पित -----
नग्न बदन लगता अति सुन्दर ,
चित्र उकेरे गजब पुरन्दर।
चोरदृष्टि से , बच नजरों से ,
रति अनंग हिये पाता हूॅं
रूप सरस पीए जाता हूूॅं ।।
ईश्वर की रचना न्यारी हैै ,
ढॅंको नहीं , यह तो प्यारी है ।
इसपर ही अवलम्बित रहकर ,
मैं जीवन जीए जाता हूॅं।
रूप सरस पीए जाता हूॅं ।।
अंग -अंग से प्रेम टपकता ,
दाता का ही भाव झलकता ।
प्रकट लास्य के गीत रसीले ,
सतत सदा गाए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूूॅंं ।।।
इससे ही जीवन का लय है ,
इससे भिन्न तो मात्र प्रलय है ।
अमृतमय इस रूपराशि को ,
भाॅंति अनेक लिए जाता हूॅं ।
रूपसरस पीए जााता हूॅं ।।
पूज्य भाव ,आसूच्य चाव से ,
अपनेे मन के ही चुनाव से ।
मुक्ति मिले मन को तनाव से ,
अनुकृति जाप किए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं ।।
पूर्ण श्लीलता की सतर्कता ,
साधन सुविधा कीअसक्तता ।
में भी किसी तह इस मन को ,
प्रेम से बहलाए जाता हूॅं ।
रूप सरस पीए जाता हूॅं।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अ्विज्ञात ,
मुख्यनियंत्रक , पूूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी
सज्जन 
--------- 
मदलोभ सज्जन त्यागकर ,
क्षमया ही पाप से विरत हो ।
सद्वचन सच्चे मार्ग से ,
विद्वान सेवा निरत हो ।
यश कीर्ति की रक्षा करे ,
हित दीन साधक नम्रता ।
सम्मान करता श्रेष्ठ का ,
वैरी से भी तो विनम्रता ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
मन मेें शिव ध्यान हो 
------------------------- 
ठंंड विभावरी , शीत प्रदेश में ,
चाॅंद चटक चाॅंदनी छिटकाई ।
देवनदी -तट, शाान्त वनांंचल ,
शान्तमना , सुख आसन पाई ।
आॅंख भरी ,मन मेें शिवध्यान हो ,
दुर्लभ योग दशा कब आई ?
भोग से मोह छुटे ही नहींं ,
अब अन्त समय तो निकट चलि आई ।।
( मेरी कृति " भर्तृहरि शतक " के हिन्दी काव्यानुवाद " शतक त्रयी से )
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
नुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे ।।
त्याग देते सब्र भी 
-------------------- 
आहत करे जब कामपीड़ा ,
साधुता सत्वर हरे ।
तन मन समर्पित भोग में ,
सज्जन को भी पागल करे ।
दृढ़ सत्यपथ गामी पुरुष ,
सज्जन मनस्वी नम्र भी ।
मान मर्यादा विमुख हो ,
त्याग देते सब्र भी ।।
( मेरे कावयानुवाद " शतकत्रयी " से )
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
नुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे ।।
नजर 
------- 
हैं साफ तो बहुत ही , पर गन्दगी ही देखें ।
नफरत भरी नजर ही ,उनकी नजर है सबको ।।
जिसको ही जब भी देखें ,आॅंखें तरेर कर वे ।
चोरों को जैसे कोई ,कोतवाल देखता हो ।।
हर सख्श खौफ खाए , कब उसकी आए बारी ।
कानों की राह नफरत , दिल में जखम बनादे ।।
मन के सुकून की तो , बस एक ही सूरत ।
पत्थर बनालें दिल को , सुख दुख नजर नआए।।
है रंग मंच दुनियाॅं , किरदार सबका अपना ।
गम दूसरों का बाॅंटेें , सुख का रहे न सपना ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक ,पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
आराम से सोता हूँ 

न तो मैं हारा हुआ जुवारी हूॅं ,
न ही अनाड़ी खिलाड़ी हूॅं ।
मैं तो अधोगामी मानवता का ,
सामान्य स्तर का एक पुजारी हूॅं ।
भलाई करके स्वयं को ,
मै परमधन्य मानता हूॅं ।
ईर्ष्या करने वालों के लिए भी ,
अपना सारा कार्य छोड़ ,
सदैव प्रस्तुत रहता हूॅं ।
इसे मेरी मूर्खता न मानें ,
मैं तो परले कोटि की ,
बुद्धिमत्ता मानते हुए ,
अपनी पीठ स्वयं थपथपा लेता हूॅं ।
इसी से आठ घंटों की नींद ,
आराम से सोता हूॅं ।।
जय हो ।
अटल 

कौशल अटलम् , चिन्तन अटलम् ,
अटलाटल कविता गीत परम् ।
कथनम् अटलम् ,कृत्यम् अटलम् ,
अटलाटल भाषा शब्द परम् ।।
निष्ठा अटलम् , वक्ता अटलम् ,
अटलाटल मैत्री - दृष्टि परम् ।
मेधा अटलम् ,मुस्कान अटल ,
अटलाटल हिन्दी - प्रेम परम् ।।
ज्ञानम् अटलम् , भक्तिम् अटलम् ,
शैली अटलम् , भावम् अटलम् ।
सम्मान अटल , गरिमा अटलम् ,
अटलाटल शोधन - बुद्धि परम् ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
श्रीकृष्ण जन्म 
--------------- 
जन्मकाल में बन्दीगृह के ,
फाटक सब खुल जाते हैं ।
दंवारपाल सब बेसुध होकर
जहाॅं - तहाॅं सो जाते हैं ।।
कालगाल में लाल न जाए ,
मात - पिता घबराते हैं ।
पत्थर रखकर निज छाती पर ,
त्याग की युक्ति लगाते हैं ।।
सूप में रखकर जिगर का टुकडा ,
तुरत ही दूर हटाते हैं ।
नन्द यशोदा की कन्या ला ,
कंस दलन को बचाते हैं ।।
यमुना बढ़ीं पाॅंव छूने को ,
देख पिता घबराते हैं ।
छन मे घुटने तक जल पाकर ,
मन ही मन चकराते हैं ।।
देवकी बसुदेव के नन्दन ,
बासुदेव कहलाते हैं ।
माॅं जसुमति और नन्द दुलारे ,
सबका मन हरषाते हैं ।।
ग्वाल बाल संग मटका फोड़ें ,
नित नवनीत चुराते हैं ।
रंगे हाथ जब पकड़े जाते ,
कान पकड़ घिघियाते हैं ।।
--- सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
उधमी श्रीकृष्ण 
---------------
उधम मचाकर माॅं जसुमति को ,
अजब ही नाच नचाते हैं ।
पानी थाल चन्द्रमा देखें ,
दोनों कर छपकाते हैं ।।
पेटभरे ना जब माखन से ,
छिपकर माटी खाते हैं ।
कहने पर मुॅंह खोल वे अपने ,
लोक तीन झलकाते हैं ।।
माखनचोर पकड़ जाने पर ,
रस्सी में बॅंध जाते हैं ।
झूठे आश्वासन से माॅं को ,
बालक कृष्ण छकाते हैं ।।
तंग करें खुद बलदाऊ को ,
नाहक उन्हें फॅंसाते हैं ।
राज की बातें स्वयं उगलते,
कहते मोल बताते हैं ।।
बड़री अॅंखियाॅं ,घुॅंघराले लट ,
नूपूर पाॅंव बजाते हैं ।
लसित मालमणि उर पर लटके ,
सबकी चैन चुराते हैं ।।
--- सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
कृष्ण कन्हैया माखन चोर
----------------------------
ग्वाल बाल संग नित छिपकर के
ग्वालन के घर जाते हैं।
कन्धों पर चढ़कर छीकों से
माखन कृष्ण चुराते हैं।।
मुॅंह में मक्खन पुता हुआ पर
खाया नहीं , बताते हैं ।
ग्वाल बाल सब अपने खाकर
झूठा उन्हें बताते हैं ।।
बरबस ही वे मुॅंह पर मेरे
माखन दही लगाते हैं।
सिकहर की ऊॅंचाई को वे
पहुॅंच से दूर बताते हैं।।
मधुबन जाते होत सबेरे
शाम गए घर आते हैं।
घर में माखन भरा पड़ा तब,
चोरी का क्यों खाते हैं ??
तर्क बुद्धि से बाल कृष्ण जी ,
माॅं को चकित कराते हैं ।
नन्हें कान्हा इसी वजह से,
मॉं से रोज़ पिटाते हैं।।
----- कवि सर्वानन्द पाण्डेय 'अविज्ञात'
मुख्य नियंत्रक,पूर्वोत्तर रेलवे, वाराणसी
तस्मै श्री गुरवे नम: 

ज्ञान का दीपक जलाएॅं ,
तम हृदय का ये मिटाएॅं ।
सुपथ जीवन का दिखाकर ,
सबल हर मन को बनाएॅं ।।
तप परिश्रम की महत्ता ,
शिष्यगण को गुरु बताएॅं ।
धैर्य से उद्यम - निरत रह ,
शिष्य में सद्गुण जगाएॅं ।।
सत् अहिंसा शान्ति का ,
संदेश वाहक ये बनाएॅं ।
दूर करके विकार मन का ,
शिष्य का जीवन सजाएॅं ।।
क्षमा करुणा युक्त करके ,
क्रोध ईर्ष्या को भगाएॅं ।
भाव मैत्री का सिखाकर ,
शिष्य को उन्नत बनाएॅं ।।
कला संस्कृति कुशल करके ,
शिष्ट सज्जन भी बनाएॅं ।
वेद से विज्ञान तक की ,
सुगम यात्रा य़े कराएॅं ।।
लोक जन कल्याण में तो ,
निपुण शिष्यों को बनाएॅं ।
गुरु की महिमा का चलो हम ,
सिर झुकाकर गीत गाएॅं ।।
--- सर्वैनन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
नन्द घर बाजे बॅंधइया
जनमे कृष्ण कॅंधइया, नन्द घर बाजे बॅंधइया ।
केई लुटावे अन्न धन सोनवाॅं , केई लुटावे धनुगइया ? 
नन्दघर बाज बॅंधइया ।।
जनमे कृष्ण कॅंधइया ,नन्द घर बाजे बॅंधइया ।
यशोदा लुटावें अन्न धन सोनवाॅं , नन्द लुटावें धेनुगइया ।
नन्द घर बाजे बॅंधइया ।।
जनमे कृष्ण कॅंधइया ,नन्द घर बाजे बॅंधइया ।
केई खुशी से मंगल गावें , केई मनहिं हरषैया ?
नन्द घर बाजे बॅंधइया ।।
जनमे कृष्ण कॅंधइया ,नन्द घर बाजे बॅंधइया ।
गोपिन मिलि सब मंगल गावैं , देव गोप हरषैया ।
नन्द घर बाजे बॅंधइया ।।
जनमे कृष्ण कॅंधइया ,नन्द घर बाजे बॅंधइया ।
बाबा नन्द पुलकि मन नाचैं , माता लेत बलैया ।
नन्द घर बाजे बॅंधइया ।।
जनमे कृष्ण कॅंधइया ,नन्द घर बाजे बॅंधइया ।।
आज का विचार 

आत्मश्लाघा ने 
इस मुकाम पर
ला खड़ा कर दिया मुझे
कि आत्म निरीक्षण , आत्म परीक्षण ,
आत्म दर्शन और आत्मचिन्तन
की सुध ही नही रही ।।
पद ने ऐसा मद भर दिया मुझमें
कि स्वयं से श्रेष्ठ
मैं किसी को मानता ही नहीं ।।
अब तो मुझे
कुछ करने की जरूरत ही नहीं,
बैठे - बैठाए ही ,
अभूतपूर्व गति से
सबकुछ होने लगा है ,
जिसका श्रेय तो
मुझे मिलना अवश्यम्भावी है ।।
अब तो मैं गुरुओं का भी
गुरू हूॅं ।।
पढ़ता रहा होऊॅं
चाहे जिन - जिन से
उन सभी का मैं
आज परीक्षक हूॅं ।
इसलिए नहीं जरूरत है
अब मुझे
आत्मनिवेदन की ।।
मैं तो पदेन
सर्वज्ञाता हो चुका हूॅं ।।
चाहे मैं मनमर्जी
सैर करूॅं
कहानियाॅं पढ़ूॅं
या कविता गढ़ूॅं ।
पद के प्भाव से लोग मुझे
कला पारखी ,संस्कृतिनिष्ठ,
सभ्यता का उपमान
और साहित्यकार उदीयमान
मानने लगे हैं ,
तभी तो लोग मेरे नाम से
स्वयं को
मर्यादित मानने लगे हैं ।।
यह बात दीगर है
कि शिष्टता , शालीनता ,
संयम और सहिष्णुता से
दूर - दूर तक
मेरा वा्स्ता नहीं रह गया है ।।
आप माने या न माने
परा बुद्धि के अभाव में
नमिता नहीं , पर
अपरा कविता तो
है ही मेरे पास ।।
ईश्वरत्व है मुझमें ,
क्योंकि जो लोग
करते हुए दिखते हैं ,
वास्तव में वे कुछ नहीं करते ।
कर्त्ता तो मैं हूॅं , एकमेव ।
इसलिए एको अहम् द्वितीयो नास्ति ।।
मेरा यह कर्तृत्व भाव
मात्र एक प्रवंचना है ,
यह मुझे संज्ञात है ,
परन्तु मैं इसे आत्मप्रवंचना
कदापि नहीं मानता ,
क्योंकि नारदमोह भी
मेरी एक अनिवार्य कामना है ,
जिसे छोड़ने की कठिन कला
नहीं आती मुझे ।।
आए तो भी
वह वरेण्य नहीं
क्योंकि तब
परिजनों की पूरी शक्ति
और सवयं के कठिन परिश्रम से अर्जित
इस पद - मद का क्या होगा ?
अनाधिकार सुलभ
मेरे तमाम भोगों का क्या होगा ? ?
--- सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
जबरों को देख बिलबिलाते हैं कुत्ते 
कुत्तों को देख गुर्राते हैं कुत्ते ,
सजातीय विकर्षण दिखाते हैं कुत्ते ।
अपरिचित को आॅंखे दिखाे हैं कुत्ते ,
मिलन हेतु मिन्नत कराते हैं कुत्ते ।।
शिकार पर फुर्ती दिखाते हैं कुत्ते ,
जब घिरते हैं तो धिघियाते हैं कुत्ते ।
अबरों पर ऐंठ दिखाते हैं कुत्ते ,
जबरों को देख बिलबिलाते हैं कुत्ते ।।
लालच में ही लपलपाते हैं कुत्ते ,
इनायत को इल्म दिखाते हैं कुत्ते ।।
रियायत के लिए रिरियाते हैं कुत्ते ,
मौका गवाॅं मिमियाते हैं कुत्ते ।।
दुलार पर दुम हिलाते हैं कुत्ते ,
हिकारत पर आॅंखें फिराते हैं कुत्ते ।
बेठौर आवारा कहलाते हैं कुत्ते ,
ठौर पाते ही पालतू हो जाते हैं कुत्ते ।।
डरने पर दुम दुबकाते हैं कुत्ते ,
चन्द टुकड़ों को चाटुकार बन जाते हैं कुत्ते ।
लाचारी में ही लिबलिबाते हैं कुत्ते ,
झपट - छिन मौज उड़ाते हैं कुत्ते ।।
हार के डर से हनक दिखाते हैं कुत्ते ,
लूटने को सनकी बन जाते हैं कुत्ते ।
लाभ पर लोटपोट हो जाते हैं कुत्ते ,
देने को दूर हट जाते हैं कुत्ते ।।
हर सीजन सुहागिनें बनाते हैं कुत्ते ,
मोहपाश में न बॅंधाते हैं कुत्ते ।
अपनों को भी काट खाते हैं कुत्ते,
हर चतुराई मानव के दिखाते हैं कुत्ते ।।
पर , बचने को भौंकना सिखाते हैं कुत्ते ,
बफादारी का मिसाल बन जाते हैं कुत्ते ।
गोदी में , गाड़ी में , विस्तर में कुत्ते ,
जीवनाथी की कमी पुराते हैं कुत्ते ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
गुरु ज्ञान की महिमा 

अल्प ज्ञान जब मुझे हुआ ,
गजराज समान मदान्ध हुआ ।
ज्ञानी होने का गर्व हआ ,
विश्वास हुआ सर्वज्ञ बना ।
लेकिन गुरुजन विद्वानों की ,‍
संगति से मदज्वर उतर गया ।
पाकर खुद को मैं महामूर्ख ,
निज अज्ञानता से उबर गया ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्यनियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
हिन्दी के प्रथम वैज्ञानिक वैयाकरण आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के प्रति ---


श्रद्धाा - सुमन 

जीवन के अन्तिम साॅंसों तक ,
वे साज - सॅंवार में लगे रहे ।
विटपों में करके काट - छाॅंट ,
सह काॅंटे रम्य बनाते रहे ।।
फेंकी उखााड़ सब झंझ - झाड़ ,
मन्दिर प्रांगण को कर सॅॅंवार ।
नव किसलय फूटे पुहुप नये ,
विकसित उपवन आई बहार ।।
संस्कृत - अंग्रेजी मिश्रधातुु ,
थी आकर्षक पर नहीं छटा ।
हिन्दी-माॅं प्रतिमा साफ किया ,
स्वर्णायित करके मिश्र हटा ।।
भक्तों ने सफाई देखी तो ,
प्राचीन मोह संवरण नहीं ,
था सांकर्य से स्नेह जिन्हें ,
स्वर्णाभा की पहचान नहीं ।।
उलटी -सीधी कोई कहता ,
बहुतों ने किया प्रशंसा ही ।
प्रतिमा से प्रस्फुटित कान्ति देख,
निज दिव्य द्युति माने सबही ।।
आचार्य तो कहते कुछ न किया ,
मन्दिर सौन्दर्य में क्या न दिया ?
बनकर प्रदीप प्रज्ज्वलित रहा ,
आखिर सर्वस्व लुटा ही दिया ।।
आएगा ऐसा भी कोई ,
वैज्ञानिकता दिखलाएगा ।
जगमग कर देगा मन्दिर को ,
तेरा अभाव नहीं जाएगा ।।
पूजूॅंं कैसे मैं तुम्हें देेव ,
तपकर आलोक विखेरगए ।
मुझ अनजाने को ढंग नहीं ,
हैं भाव किन्तु दर्शन न हुए ।।
जाने- अनजाने पुष्प जुटा ,
कुछ शब्द -सुमन से भरा थाली ।
अवलोकन पूज्य सामग्री का ,
हैै दिव्य मूर्ति थााली खाली ।।
हेे शब्दशिल्प के ज्ञानी तुम !
हे आाशुतोष ! यह वर दे दो ।
बिन हिन्दी-पदवी दास हूॅॅं मैं ,
बलहीन बाहु , कुछ बल दे दो ।।
( मेरे प्रथम खण्डकाव्य " किशोरी अभिनन्दिनी " से )
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
हूँ मित्र साठ का मैं वय से 

कुछ जुड़ेे हुुएे , जो जुडेंं कभी ,
दिल की बगिया के फूल सभी ।
फूलोंं को महक का नहीं पता
आनन्दित मुझको करें सभी ।।
सुख अपना व्यक्त करूॅॅं कैसे ,
ज्ञापित कृृतज्ञता हो कैैसेे ?
पााकर सबको बड़भागी मैैं ,
‍हूॅॅं मित्र‍ साठ का मैं वय सेे ।।
आगमन नव रात साथी !
अस्त होने को विकल अ्ब ,,
सूर्य तज निज ताप साथी ! 
मनीष मन संकेत देता ,
आगमन नव रात साथी !!
रा्त्रि के अवसान पर फिर ,
उषा का मुस्कान साथी !
रवि अतुल कंचन समेटे ,
लाए फिर दिनमान साथी !!
सरोज गरिमा से सजाए ,
ज्ञानवी का हाथ साथी !
सुधांशु अरु दिव्यांशु फिर तो ,
नवल तनय हिमांशु साथी !!
त्यागमय अवदान तेरा ,
मिल रहा अनवरत साथी !
स्वत्व को अपने मिटाकर ,
सुलभ सर्वानन्द साथी !
आगमन नवरात साथी !!
--- कवि सर्वाानन्द पाण्डेय, अ्विज्ञात ,
मुख्यनियत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे ,, वाराणसी ।
नियति आगे -आगे 

कहाॅं से चला था , कहाॅं जा रहा हूॅं ? 
उलझा हूॅं खुद , या कि उलझा रहा हूॅं?
लिए उलझने साथ अपने बहुत से ,
खुश हूॅं या हॅंसते हुए रो रहा हूॅं ? 
बुने जाल अनगिन हैं अपनों के धागे ,
फंसा हूॅं उसी में न जागे न भागे ।
मजा इसमें फिर भी मुझे आ रहा है ,
न चलता कोई बस नियति आगे - आगे ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
बेपर्द होने से बचें 

छू नहीं सकता जमाना , बेइजाजत आपको ।
बस बदन , जेहन औ जुबाॅं , बेपर्द होने से बचे ।।
परिचय के संग चित्र लगाना ,
यह तो बहुत जरूरी है ।
मित्रों का पहिचान जानना ,
सबको सख्त जरूरी है ।।
परिवारों , बच्चों का फोटो ,
आनन्द सुखदायी है ।
आयोजनों, समारोहों का ,
दृश्य प्रेरणादायी है ।।
नदी , पहाड़ों , झीलों , झरनों ,
पुष्प , लताओं ,सगर से ।
उद्यानों , भवनो , यानों के ,
चित्र न कम हैैंं आखर से ।।
भाॅंति -भाॅंति के पशु - पक्षी भी ।
उुपयोगी मनभावन हैैं,
यंत्र ,मशीनेंं , शालाएं भी,
धर्मस्थल भी पावन हैैं ।।
कविताा गीत, लेख,सम्बादों,
कथा - कहानी भावों को ,
ग्रंथ -- उद्ररण हास्यामृत सेे ,
भर दें दिल के घावों को।।
पर कामुक चित्रोंं -भावों से ,
अपशब्दों और वारों से ।
तनिक करें परहेज मित्र जन ,
नंगेपन , अ्तिचारों से ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अवििज्ञात ,
मुखयनियंंत्र‍क , पूर्वोत्तर रेलवे ,वाराणसी ।
दर्द 

दर्द से क्यों ऊबकर , कहते हो जीवन दर्द है ?
हॅंसमुखी से सीख लो , जीना हमारा फर्ज है ।
दर्द जिसको तनिक ना हो, वह भला क्या मर्द है ? 
जो नहीं हमदर्द , समझो वह मरा - सा सर्द है ।।
जो हॅंसावे दूसरों को , हर रहा वह दर्द है ।
दर्द सहकर भी हॅंसे जो , वाकई वह मर्द है ।
कमजोर पर जो ही हॅंसे ,समझो कि वह नामर्द है ।
हास्यरस आबाद हो , नतसिर हमारा अर्ज है ।।
आपका ही --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक ,पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
बदहुकूमत 

फिरकापरस्ती ताकतें , मौकापरस्ती हरकतें ।
मजबूत ये पाये हैं दोनों , आज के जनतंत्र के ।।
नेता पुलिस कुछ अफसरों की , घालमेली तिकड़में ।
मंजर तमाशा का बना , पेशे नजर औकात है ।।
आतकवादी हैं बने , तमाशाई हुड़दंगिए ।
लाचार जनता तो बनी , अब करतबी लंगूर है ।।
शह मत का यह खेल या ,है बेबसी लंगूर की ?
तमाशबीन मदारिए , हैं समझते नामर्द हैं ।।
हौशला अफजाई अब , बम गोलियों से हो रहा ।
फैक्ट्री से मिलते एक ही , दोनों को ही हथियार हैं ।।
दोनों के चलते खर्च भी हैं , एक ही तो स्रोत से ।
पहला तो कर है वसूलता ,पर रंगदारी दूसरा ।।
है सरपरस्ती खोजती , जनता इन्हीं के बीच से ।
पर , है मुनासिब सोचना ,कि विकल्प कोई अन्य है ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
बन्दिशें

बन्दिशें बेकार सब , बेेफििक्र हों जब शर्म से ।
बेतजुर्बी हिकमतें लाचारगी के खयाल से ।।
जज्बात में मंजूर सब , पर हकीकत शिफर है ।
हैं बेखबर हर चीज से , बकवास से वे बाखबर ।।
मतलबी खुदगर्ज रहते , मदद में हैं वे लगे ।
तेल दीये की चुराकर रोशनी वे कर रहे ।।
कंगाल थे कुुछ साल पहले ,अब खजाना भर गया ।
चने को मोहताज थे वे , आज काजूू खा रहे ।।
पूछो सबब उनसे जरा , कि महल कैसे बन रहा ?
कीमती सामान अल्लादीन के ही चिराग से ।।
शर्मगी से दूर हैं , पानी बना सब खून हैै ।
रंग रोशन से ही उनके , चेेहरे का नूूर है ।।
----कवि सर्वानन्दद पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नििययंत्रक , पूर्वोत्तर रेललवेे , वाराणसी ।
समदृष्टि मुझे दे दे 

जप नाम बहुत करते , पहले भी किए होंगे,
प्रह्लाद अजामिल - सा , कोई न किया होगा ।।
कुछ मन्दबुध्दि पापी , पहले भी रहे होंगे ।
गुणहीन मेरे जैसा , कोई न रहा होगा ।।
कर नाथ कृपा मुझपर , भक्तों को मिली जैसी ।
लोगों पे दया करके , मुझपर भी थोड़ी कर दे ।।
समदृष्टि मुझे दे दे , आॅंखें हैं मेरी मैली ।
करुणा की झोली तो , खाली है थोड़ी भर दे ।।
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय ,'अविज्ञात '
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
जागता भी नहीं और सोता नहीं 

इस बस्ती में मन ना लगे , जाने क्यूॅं ,
हाल मेरी बनी है अजब देखिए ।
कामनाओं पर अकुश लगाया नहीं ,
हार पर हार मेरी गजब देखिए ।।
आॅंख से अश्रु अब तो निकलते नहीं ,
हॅंस के ऐसा रोया , कोई रोता नहीं ।
हाल ऐसी बनी मेरी तनहाई का ,
जागता भी नहीं और सोता नहीं ।।
है समझ ही नहीं मुझे औचित्य का ,
सीख फिर भी किसी की नहीं मानता ।
जाने अनजाने आए किसी कार्य को ,
कह सकता नहीं कि नहीं जानता ।
चाहता हूॅं सुधरना अभी से सही ,
कोई भी तो बता दे , मैं कैसे रहूॅं ।
उम्र के शेष लमहें कटें ठीक से ,
देख बर्बादी बच्चों की कैसे सहूॅं ??
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
नीति परक दोहे  

नीम न मीठी हो कभी ,गुड़ - घी सींचे लोक ।
मधु भी तीता ना लगे , तब क्यों भारी शोक ?? 
कुत्तों का दुम बदलना स्वयं में टेढ़ी बात ।
मनमाने की शोच से दिन न बनेगा रात ।।
आप भला तो जग भला , भीतर अपने देख ।
अन्दर ही सब रंग हैं , जैसा भर आरेख ।।
अलंकार क्या रूप को । शस्त्र से सजे न वीर ।
अति आचरण न शोभता , अविवेक ना धीर ।।
भूषण उत्म शील है , कृत्य सभी शुभ कर्म ।
समझदार संकेत का , ठीक समझते मर्म ।।
वही भूमि उर्वरक जल, बीज मात्र है मूल ।
मीठे -तीते फल मिलें , पुष्प कहीं ,कहिं शूल ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
शब्द - सुमन
ग्यारह अगस्त, 1981
(हिन्दी के प्रथम वैज्ञानिक वैयाकरण : हिन्दी के पाणिनि - आचार्य श्री किशोरी दास वाजपेयी की पुण्य तिथि ) 
जीवन का अन्तिम पड़ाव ,एकाकी वास किशोरी का ।
जीया , जीता जो वही जानें , कितना अवसाद विधुर मन का ।।
बहु बेटा कहते हटा दिया , दादा ने हमको निज गृह से ,
दादा कहते थे छोड़ मुझे ,घर से निकले अपने मन से ।।
कहने का मतलब एकाकी जीवन जीये वे बुढ़ापे में ,
तप किया जहाॅं से गुरुवर ने , रह गए अन्त तक कनखल में।
जीवनभर झेला कष्ट महा ,वृध्दाश्रम में भी वही रहा ,
जब अन्काल था सन्निकट , तब महाकाल क्षयरोग गहा ।।
जीवन के उनके अन्तिम दिन , विद्वानों की थी भीड़ लगी ,
कहते थे अस्फुट शब्दों में , आॅंखें थीं सबकी अश्रुपगी ।।
गाड़ी का इंजन चला गया , डिब्बे भर ही अब शेष रहे ।
जाने को कहो विद्वानों को , सबको ही मेरा प्णाम रहे ।।
बस इतना मुख से निकला था , बैठे पियजन सब फफक पड़े ,
देखे सब वारि विलोचन भरकर, प्राणवायु जब निकल पड़े ।।
सन् उन्नीस सौ एकासी की , ग्यारहवीं तारीख रही ,
स्वतंत्रता का अगस्त माह था , अर्ध्दरात्रि की घड़ी रही ।।
पत्रों ने छापा शोकाकुल , हिन्दी का पाणिनि चला गया ,
नहीं रहे अब प्रथम व्याकरणी , हिन्दी का ललकार गया ।।
निज परिजन के निधन -शोक -सा, साहित्य जगत होकर अधीर ,
सजल नेत्र सब कह इठे , गए सुकवि स्वतंत्रता वीर ।।
बारह अगस्त की दोपहरी , गंगातट पर हरिद्वार में ,
भीगे नेत्रों मुखाग्नि दिए , मधुसूदन कठिन सन्ताप में ।।
मातृभूमि का वह सपूत गंगाजल में समा गया ,
प्रभायुक्त था जीवन जो , गंगा प्रवाह के साथ गया ।।
पंचावयव की बनी देह , पाॅंचों तत्वों में बदल गई ,
क्षीति जल पावक गगन समीरा,जा-मिल प्रकृति में समा गई ।।
(मेरे द्वारा रचित खण्डकाव्य " किशोरी अभिनन्दिनी " से उध्दृत )
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
शादी का ढंग तो आर्ष रहा 
 
उन्नीस सौ उन्नीस में ,शास्त्री सोलन में अध्यापक ।
शादी की बात हुई पक्की , उल्लसित सरस्वती आराधक ।।
किशोरी पहुॅंचे कानपुर , चाचा के चरण छुए जाकर ।
चाचा -चाी का स्नेह अतुल , मौसी भाभी को पुलकित कर ।।
मनचाहा रिश्ता न पाकर, चाचाजी क्षणभर हुए रूष्ट ।
थी ललक बहू को पाने की , चाचा - मौसी तो महातुष्ट ।।
शादी का ढंग तो आर्ष रहा , था पढ़ा पाठ मितव्ययिता का ।
अर्जित भी हुआ अनुशंस महा , नहिं बोझ बना कन्या पितु का ।।
ना नाई ना बाजा हाथी , वे अदद चार थे बाराती ।
जंजीर पहनकर मॅंगनी की , पहिचान रही पीली धोती ।।
मुछं शादी थीं दुलहे की , कांग्रेसा कुरता खद्दर का ।
शौकीनी थी या मजबूरी , पर समारोह राष्ट्रीयता - सा ।।
श्री किशोरी दास तब , दास दुलारी के बने ।
गार्हस्थ जीवन के स्वयं कर्णधार थे ।
माताथीं न पिता थे न भाई बहन खेत बैल ।
व्याकण प्रणेता वह , शारदा के दास थे ।।
किशोरीदास नाम से , थे विद्यादास काम से ।
दुलारी दास धाम के , थे क्रोधी परशुराम - से ।।
( दुलारी = आचार्य श्री किशोरी दास वाजपेयी की पत्नी का नाम )
मेरे द्वारा रचित खण्डकाव्य : किशोरी अभिनन्दिनी से उध्दृत यह रचना है ।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
पद दलन को प्रतिबद्ध हूॅं 

अवमानना की कल्पना से , मैं बना बेहाल हूॅं ।
कमियाॅं छिपाने के लिए , अपना रहा भौकाल हूॅं ।।
मन में भय पाले हुए , पद दलन को प्रतिबद्ध हूॅं ,
उनकी चुनौती स्वप्न की , सच मान मैं सन्नद्ध हूॅं ।।
बात सीधे मुॅंह न करना , अब तो मेरा शगल है ।
नसे में धुत चीखना , अपशब्द मेरा हमल है ।।
कौन क्या करता न करता , यह समझ आता नहीं ।
सामने जो भी मिला , दी गालियाॅं उसको वहीं ।।
कायर बनाया कर्मियों को , स्वयं कायरराज हूॅं ।
कुछ नपुंसक साथ हैं , जिनका बना सरताज हूॅं ।।
इज्जतभरी नजरों से कोई , भी मुझे ना देखता ।
गाली दिया जिसको भी मैं ,उससे स्वयं ही झेपता ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
दफा 109

दुष्प्रेरण के अर्थ मे , यौन प्रेरणा लाय ।
कारण को परिणाम के , संगत माना जाय ।।
अपराधी की भाॅंति ही , प्रेरक को भी दण्ड ।
उभय पक्ष की हरकतें , तब ही होंगी ठण्ड ।।
लालच में सहमति बनी , पर जब दोहन बन्द ।
दोहक ही वादी बनें , सहानुभूति के छन्द ।।
सामाजिक स्थल बने , चूम - चाट के केन्द्र ।
दुष्प्रेरक यह कार्य है , साम्राज्य कामेन्द्र ।।
प्रेयसि प्रियतम -सा दिखे ,आपस में व्यवहार ।
कालेजों बाजार में , प्रेम का चढ़ा बुखार ।।
मुट्ठीभर ही लोग हैं , हाट चाट शौकीन ।
भारतीय अन्दाज को वे माने तौहीन ।।
आक्सीजन है प्रेरणा , ईंधन कामी लोग ।
कामाग्नि बूझे नहीं , विलग करो संयोग ।।
कानूनन नहीं नग्नता , है एक उचित विचार ।
पर संसर्ग भी स्वेच्छया , है एक महाविकार ।।
गर्भपात नहिं उचित है , क्वांरी माॅं ना ठीक ।
उच्छृंखल सहवास में , सहमति भी ना ठीक ।।
जनता के प्रतिनिधि सभी , जन से करें विचार ।
रहन - सहन ना उचित तो ,मिटे न यौन विकार ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
पन्द्रह अगस्त
पन्द्रह अगस्त पन्द्रह अगस्त हरभारतीय को कण्ठस्थ ।
अंग्रेज हुकूमत अपदस्थ सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
हर गाँव नगर से चली टोली जब मची खून की वह होली ।
तोपें बन्दूकें हुईं न्यस्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
जब जान पे खेले सेनानी तब ब्रिटिश फौज भी हुई त्रस्त ।
यूं हिम्मत उनकी हुई पस्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
उत्सर्ग प्राण कर गए लाल भारत का ऊँचा किए भाल ।
भय फॉंसी का भी नहीं व्यक्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
ललनाओं ने भी दिए प्राण तब ही दासता से मिली त्राण ।
स्वराज दिलाए देशभक्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त।।
दिवंगतों की ज्योति अमर बलिदान की उनसे मिली डगर ।
शासन परदेशी हुआ ध्वस्त सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त ।।
श्रद्धाञ्जलि होकर संगठित करके उनको महिमामण्डित ।
उनके चरणों में विनत-प्रणत सन् सैंतालिस पन्द्रह अगस्त ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय 'अविज्ञात'
मुख्य नियन्त्रक, पूर्वोत्तर रेलवे, वाराणसी
स्वतंत्रता सेनानिनम्

स्वातंत्र्य हेतु शोणितम् ,
महान राष्ट्र भक्तिनम् ,
दिवंगतम् सेनानिनम् ,
नमामि वीर सैनिकम् !!
महान राष्ट्र गौरवम् ,
विजय निनाद रौरवम् ,
मनोविनोद सौरभम् ,
नमामि हिन्द सैनिकम् !!
सर्वधर्मSनुष्ठितम् ,
अशान्ति भय विनाशिनम् ,
मातृभूमि सेविनम् ,
नमामि वीर सैनिकम् !!
साहसी ओजस्विनम् ,
तेजस्विनम् मनस्विनम् ,
पराक्रमी यशस्विनम् ,
नमामि वीर सैनिकम् !!
जले थले महीतले ,
व्योम गिरि हिमस्खले ,
प्रवास अनिकेतनम् ,
नमामि वीर सैनिकम् !!
महापदम् अलंकृतम् ,
समृद्ध स्निग्ध मौक्तिकम् ,
स्वकीय कीर्ति अमृतम् ,
नमामि वीर सैनिकम् !!
स्तुत्य देश वाशिनम् ,
सुसंस्कृतम् समादृतम् ,
विनत प्रणत् निवेदितम् ,
नमामि हिन्द सैनिकम् !!
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
सावन 

सावन हवा करता ठिठोली ,
रूपसी संग पुरुष - सा ।
गाल चूमता , केश से ,
खिलवाड़ करता हरूष - सा ।
रोमांचकारी दंश से ,
बरबस निकाले सिसकियाॅं ।
स्पर्श से निर्वस्त्र तन ,
मीठी कसक में युवतियाॅं ।
जंघों से भी कपड़े हटाकर ,
कॅंपकॅंपाता पैर को ।
गुदगुदी से नायिका - मन ,
भूल जाता वैर को ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्त रेलवे , वाराणसी ।
पैसे से ही मौज है सारा 

पैसे से ही मौज है सारा ,पैसा चूमे - चाटेंगे ।
केशर पिस्ता ड्रिंक मलाई , पैसे से ही काटेंगे ।।
अपनी सारी कमियों को अब , पैसे सेही पाटेंगे ।
बिना पढ़े ही शोधपत्र हम , नाम से अपने छापेंगे ।।
पैसे गिनते सोएॅंगे अब , पैसे को ही जागेंगे ।
बड़े - बड़ों की औकातों को , पैसे से ही नापेंगे ।।
जो विपरीत तनिक भी दीखे , खूब कहर हम ढाएॅंगे ।
दस नम्बरी कतली गुण्डे , पैसे से हम पालेंगे ।।
पत्रकार ,कवि,,सूर्य न जाए ,वहाॅं भी जाकर झाॅंकेंगे ।
संकीर्तन मेरे प्रताप की , बीवी बच्चे गाएॅंगे ।।
चमचे तो पाकेट के मनई , सबपर डोरा डालेंगे ।
एक ही लाठी से पैसे की , सबको नाच नचाएॅंगे ।।
पैसे में ही भोग है सारा , ओढ़, बिछाए ,खाएॅंगे ।
सर्वानन्द निहित पैसे में , जैसे भी घर लाएॅंगे ।।
- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवेे , वाराणसी ।
अॅंकड़ ऐंठ में कमी न आए 
 
प्रेम किया है कौन न करता ,इसमें क्या शरमाना जी ? 
चाहे जैसे रहें साथ में , जब हम दोनों हैं राजी ।।
कुर्ता को पतलून बनालें , कौन टोक पाएगा जी ?
सिविल में कोई ड्रेसकोड ना ,कौन रोक पाएगा जी ??
चोरी रोज करो घर बाहर ,नजरों से बच जाना जी ।
जैसे भी हो आगे बढ़ जा ,धनपति है बन जाना जी ।।
अपराथों की होड़ में लग जा ,बड़े -बड़े लिपटाना जी । ,
पकड़ाने की बात समझ जा ,जेल है एक जिमखाना जी ।।
विरले में ही दम है वह, जो पहला पत्थर मारे जी ।
यहाॅं दूध का धुला न कोई ,वाह्य चमक के तारे जी।।
अॅंंकड़ ऐंठ में कमी न आए ,पूरी धाक जमाना जी ।
साधु किसी को यहाॅं न भाए ,बदजुबान फरमाना जी ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
मिलते कोई विरले कहीं 

दान करना गुप्त ढंग से ,
अतिथि का सम्मान भी ।
चुपचाप पर उपकार से , 
कृतज्ञता से कृतार्थ भी ।
नहिं गर्व धन ऐश्वर्य का ,
निन्दा के स्वर बिलकुल नहीं ।
ऐसे कठिन तप के ब्रती ,
मिलते कोई , विरले कहीं ।।
---कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
मुग्धते मन श्रान्त भी 

घनघोर घन घेरी घटा ,
धन धान्यमय धजती धरा ।
कदम्ब - केलित कसकमय ,
मारुत प्रवाहित मद भरा ।
मोर मोरनियों के कलरव ,
गूॅंजते वन प्रान्त भी ।
तापसी भोगी बराबर ,
मुग्धते मन श्रान्त भी ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय, मुख्य नियंत्रक ,
पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी
हॅंसतीं मनोरम घाटियाॅं 

छाई घटा आकाक्श में ,
सुन्दर गढ़ी - सी पहाड़ियाॅं ।
मयूर - नृत्य से शोभतीं ,
हॅंसतीं मनोरम घाटियाॅं ।
पथिक पास प्रिया नहीं ,
सुख दु:ख समन्वित यह दशा ।
हृदय व्याकुल हो रहा ,
कैसी प्रकम्पित ग्रहदशा ?
व्यतीत करना दिन कठिन ,
जलता विरहिणी का हृदय ।
आकाश विद्युत कौंधता ,
घन - गर्जना ढाता प्रलय ।
मन व्यथित करता केवड़ा ,
क्रीड़ा मयूर का नृत्य भी ।
प्रज्ज्वलित कामाग्नि अब ,
असह्य प्रकृति - कृत्य भी ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोतत्र रेलवे , वाराणसी ।
असीम शान्ति - सुख
न कल नकल किया , न आज कर रहा ,
नगर - नगर चला , डगर नहीं मिला ।
नजर पथर गया , दृग खुला रहा ।
नवल - धवल मुझे , कोई नहीं मिला ।।
मनुष्यता सदा छलक - छलक रहा ,
बढ़ाया हाथ ,पर अत्यल्प हीं मिला ।
कल्पना का सच , मैं खोजता फिरा ,
खराब खोजते , स्वयं से ही मिला ।।
चमक - धमक कभी , पसन्द ना रहा ,
किसी से ना कोई , किया कभी गिला ।
खनक - हनक से मैं , दूर ही रहा ,
असीम शान्ति सुख , पर मुझे मिला ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
भाग्य का ही खेल सब 

जिस पिटारे में भरा था , सर्प पीड़ित भूख से ।
छिद्रकर उसमें घुसा , लालच में चूहा चूक से ।
साॅंप ने चूहे को खाया , छिद्रमार्ग से मुक्ति भी ।
भाग्य का ही खेल सब , हो नाश चाहे वृद्धि भी ।।
पूर्वजन्म के कर्म का , सुख - दु:ख हम हैं भोगते ।
कर्मानुसार ही बुद्धि भी , तब भाग्य को क्यों कोसते ?
विवेक अर्जित ज्ञान से , निज कर्म क्यों न सुधारते ?
अपने सुकर्म विचार ही , दुर्गति से सबको उबारते ।।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात ,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
रक्षा वन्धन 

रिश्तों मे बॅंधना नहीं , बिलकुल जिन्हें सुहाय ।
रक्षा वन्धन में नहीं , उनको बाॅंधा जाय ।।
अपनी बहनों का जिन्हें , तनिक नहीं है ध्यान ।
वे परबहनों को कहो , कैसे दें सम्मान ??
भाई बने कलाम


बहनों का अरमान है , भाई बनों कलाम ।
ज्ञान मान सम्मान से , बन जा देश ललाम ।
बनजा देश ललाम , भेद मत मन में रखना ।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख , इसाई सबसंग रहना ।
कहते सर्वानन्द , मिटा दो भेद की खाई ।
बहन मनावे खैर , मान सबको ही भाई ।।
भाई ने उपहार में , वचन दिया गम्भीर ।
रक्षा तेरी सब करें , रहो न तनिक अधीर ।
रहो न तनिक अधीर , पीर तेरी हर लेंगे ।
उत्पीड़न से मुक्त , तुम्हें हमसब कर देंगे ।
कहते सर्वानन्द मुक्तमन विचरण करना ।
रहना तू उन्मुक्त , ज्यादती कभी न सहना ।।
छोड़ो बीती बात को , बहुत हुईी तकरार ।
बढ़ आगे सद्भाव से , सुविधा की भरमार ।
सुविधा की भरमार , दिखा दो प्रतिभा अपनी ।
हक का रहे संज्ञान , एक हो कथनी -- करनी ।
कहते सर्वानन्द लायॅं , समता घर - घर में ।
सम होगा अनुपात , पुत्र - पुत्री की दर में ।।
जय रक्षावन्धन ।
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञातल,
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।
वन्धन रक्षा का 
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रक्षा का ही नहीं अपितु यह नेह का वन्धन है ।
आपस में इक दूजे से यह स्नेह का वन्धन है ।
अखण्ड बहन रहने की ललक में रोली चन्दन है ।
उत्पीड़ित बहनों का इसमें चीख व क्रन्दन है ।।