बुधवार, 17 जून 2015

कुक्कू(अविनाश) 
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मन मुग्ध करे सौंदर्य तेरा, चंचलता सुख देता अनन्त।
कोमल कपोल मृदुहास तेरा, खुशियाँ छिटकावे दिग्दिगन्त।।
दीर्घायु प्राप्तकर ओ शिशु तुम, उनन्त हो सपने हों जीवन्त।
कर विश्व प्रेम की हवा तेज, तम दूर करो मठिया महन्त।।
करत किलोल भए लोचन विभोर,कर पद, प्रचलन मन वश में करत है।
करन चाहत कुछ कहन चाहत,पर अंगुली अधर रह रह फरकत है।।
सविता सपूत अस सुघर सुहात, मन किसी का भी नहीं दूजे काम में सरत है।
नजर न लगे इस सविता प्रकाश को, जगमग आँगन व घर को करत है।।
चितवत चहुँदिशि चकित चकोर देख, किलकत रह-रह मेटत मकार है।
हँसि के लुभाइ लेत तोके मोके सबही के, मामी को करावत ये शोध सरकार है॥
उचकि के उछलत हिये में हिलोर होत, नाहक उठावे सिर नाहर लजात है।
तजि सब काज निज कुक्कू को निहारूँ मैं, मधु देत माधुरी को प्रीति का तो प्यार है॥
छोेटे-छोटे पद पर उदर गणेश जस, उर भाग देखन में प्रेम का पठार है।
नील कमल जस नवन युगल नीक, नासिका उभार देखि सुख ही अपार है॥
झपकत पलक बुलावे जस सबही को, अपलक देखन को मन ही मयूर है।
करत कमल झूठ कोमल कपोल दोऊ, टपकत रस सरोबार मेरा उर है॥
राम नरेश जी से ओम का प्रकाश हुआ, सविता की प्रीति फिर हास अविनाश है।
सावित्री मनोज सुख अति द्विगुलित हुआ आरती से शारदा की कटित विनाश है॥
कुक्कू के किलोल से राजेश उल्लसित हुआ, चूमि चूमि मुख अब नाचत राकेश है।
सविता प्रकाश से हुलास सबही को हुआ, राम नरेश जी का उदय विकास है॥
रचयिता---- सर्वानन्द पाण्डेय,"अविज्ञात"

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