गुरुवार, 18 जून 2015

खोट से चोट
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वस्त्र तो तेरे हैं सतखण्डी,कपड़े की क्या आई तंगी?
माता-बहन हो या रण चण्डी,जिस्म दिखाती क्यों तू नंगी?
गुलाबी तेरे सुन्दर होंठ ,लिपिस्टिक उस पर देती पोत ।
बिछाती जब शतरंजी गोट , दिखाती अपने मन का खोट ।
फूल के पंखड़ियों- से गाल ,छिपाती क्यों तू क्रीम से खाल ।
बनाकर आक्रामक तू हाल ,बदल देती दुनियाॅंं की चाल ।
सहज ही तेरी हिरनी चाल ,घटा- से बिखरे लम्बे बाल ।
सॅंवरकर ठोंके जब तू ताल ,छटा देखे हों सभी निढाल ।
रचयिता--- सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '

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