शरद ऋतु
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शरद ऋतु घनघोर वारिस , कठिन गृह से वहिर्गमन ।
ठिठुरन भरी ठंडी ,सजन से , लिपटने की है लगन ।
सर्द ठंडा पवन रतिश्रम , की थकान मिटा रहा ।
कठिन दिन भी मौज में संग सुन्दरी के बिता रहा ।।
ठिठुरन भरी ठंडी ,सजन से , लिपटने की है लगन ।
सर्द ठंडा पवन रतिश्रम , की थकान मिटा रहा ।
कठिन दिन भी मौज में संग सुन्दरी के बिता रहा ।।
लास्य में उन्मुक्त नारी , प्यार पाने के लिए ।
संलग्न जिस भी कर्म में , प्रिय को रिझाने के लिए ।
सामर्थ्य उसको रोक पाने , का किसी में है नहीं ।
ब्रह्मा भी प्रेमोद्योग से , उसको डिगा सकते नहीं ।।
संलग्न जिस भी कर्म में , प्रिय को रिझाने के लिए ।
सामर्थ्य उसको रोक पाने , का किसी में है नहीं ।
ब्रह्मा भी प्रेमोद्योग से , उसको डिगा सकते नहीं ।।
सर्वानन्द पाण्डेय " अविज्ञात "
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