प्रेम : एक जैव संगीत
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साथ प्रिय का
कहे - अनकहे
होता प्रियतम का
जीवन संगीत ।
पाकर साथी का साथ
चाहे अनचाहे
आॅंखों ही आॅंखों में
होता संवाद
जो प्रिय प्रियतम दोनों के
सुप्त संवेदी
तन्तुओं को करता अवश्य
झंकृत ।
उत्पन्न मूक हलचल
नीरव मन में ,
सुने अनसुने
उस जैव झंकार से
बन जाता
एक मधुर संगीत ।
सुर तरंगों का
स्वाभाविक रूपायन ,
दिखे - अनदिखे
वाह्य नेत्रों से ,
पर हो जाता आगोशित ,
साथी मनमीत ।
एक तड़ित उद्दीपन ,
उस अदृश्य रूपायन के
सुलभ आकर्शण से ,
होता मन में
संचरित ।
सहज संस्पर्श
एक दूजे का
छू लेता मन को
करता हुआ
जैव - उष्मा - विनिमय - परिपथ
सम्पूरित ।
होता सुखद उद्रेक
रतिभाव का ,
उस उष्मा संचरण से ,
करता समस्त परिताप
विगलित ।
रति अणुओं के
प्रवाह मान नाभिकीय संलयन से
होता परमानन्द
स्रवित ।
परमानन्द के रिसाव से ,
अभिसिंचित मन प्राण में ,
अजस्र अनुराग होता
प्रस्फुटित ।
इन्द्रियातीत रूप में
कानों को भी दिखाई
और आॅंखों को भी सुनाई
देने वाला वह अनुराग
शरीर के रोम - रोम से होता
अनुभूत ।
उस प्रेमावृत्त परिस्थिति में
एक मूक संगीत के
छन्दमुक्त लय
और प्रकृति के ताल में
अद्वितीय जीवनीशक्ति होती
सन्निहित ।
वह जीवनी शक्ति
अपनी पूरी लय - ताल
और मनोरम स्वर से
रखती सृष्टि चक्र को
सतत गतिशील ।
गतिशीलता का
उन्मेश है प्रकृति
तो उसकी झंकृति
मानव का
इतिहास धर्म
सभ्यता और संस्कृति ।
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साथ प्रिय का
कहे - अनकहे
होता प्रियतम का
जीवन संगीत ।
पाकर साथी का साथ
चाहे अनचाहे
आॅंखों ही आॅंखों में
होता संवाद
जो प्रिय प्रियतम दोनों के
सुप्त संवेदी
तन्तुओं को करता अवश्य
झंकृत ।
उत्पन्न मूक हलचल
नीरव मन में ,
सुने अनसुने
उस जैव झंकार से
बन जाता
एक मधुर संगीत ।
सुर तरंगों का
स्वाभाविक रूपायन ,
दिखे - अनदिखे
वाह्य नेत्रों से ,
पर हो जाता आगोशित ,
साथी मनमीत ।
एक तड़ित उद्दीपन ,
उस अदृश्य रूपायन के
सुलभ आकर्शण से ,
होता मन में
संचरित ।
सहज संस्पर्श
एक दूजे का
छू लेता मन को
करता हुआ
जैव - उष्मा - विनिमय - परिपथ
सम्पूरित ।
होता सुखद उद्रेक
रतिभाव का ,
उस उष्मा संचरण से ,
करता समस्त परिताप
विगलित ।
रति अणुओं के
प्रवाह मान नाभिकीय संलयन से
होता परमानन्द
स्रवित ।
परमानन्द के रिसाव से ,
अभिसिंचित मन प्राण में ,
अजस्र अनुराग होता
प्रस्फुटित ।
इन्द्रियातीत रूप में
कानों को भी दिखाई
और आॅंखों को भी सुनाई
देने वाला वह अनुराग
शरीर के रोम - रोम से होता
अनुभूत ।
उस प्रेमावृत्त परिस्थिति में
एक मूक संगीत के
छन्दमुक्त लय
और प्रकृति के ताल में
अद्वितीय जीवनीशक्ति होती
सन्निहित ।
वह जीवनी शक्ति
अपनी पूरी लय - ताल
और मनोरम स्वर से
रखती सृष्टि चक्र को
सतत गतिशील ।
गतिशीलता का
उन्मेश है प्रकृति
तो उसकी झंकृति
मानव का
इतिहास धर्म
सभ्यता और संस्कृति ।
सर्वानन्द पाण्डेय ,' अविज्ञ '
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