दिवाली के उजाले में
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अपनों के तो सभी होते हैं,
कभी किसी गैर का भी होकर तो देखो।
पाना-खोना तो जीवन ही है,
कभी अपने अहं को खोकर तो देखो।
कहते हो कि गन्दगी भरा है समाज,
कम से कम अपनी मैल धोकर तो देखो।
सोना-जागना तो लगा हुआ है,
कभी पूरी नींद सोकर तो देखो।
शीतल छूअन तो सबको सुखद है,
कभी अंगोर को टोकर तो देखो।
किसे क्या करना चाहिए का विचार छोड़,
कभी कोई जिम्मेदारी ओढकर तो देखो।
बढती फैलती नफरत के इस दौर में,
प्रेम के धागे में स्वयं को पोकर तो देखो।
भले लोगों की कमी नहीं जमाने में,
इन्सानियत का बीज बोकर तो देखो।
सारा गम गफलत हो जाएगा दिल का,
कभी जीभर रो कर तो देखो।
आपा-धापी में क्या सूरत बना रखे हो,
कभी बिना सपने के सोकर तो देखो।
बहुत कुछ किया सर्वानन्द के लिए,
जो सुकर्म बाकी हैं वो करके तो देखो।
अच्छे से अच्छा साथ सुलभ है धरती पर,
जरा अटल,मंजू,का सानिध्य पाकर तो देखो।
श्रीलक्ष्मी गणेश को तो सभी पूजते हैं,
उर में माँ सरस्वती को बसा कर तो देखो।।
रचयिता---- सर्वानन्द पाण्डेय 'अविज्ञात '
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अपनों के तो सभी होते हैं,
कभी किसी गैर का भी होकर तो देखो।
पाना-खोना तो जीवन ही है,
कभी अपने अहं को खोकर तो देखो।
कहते हो कि गन्दगी भरा है समाज,
कम से कम अपनी मैल धोकर तो देखो।
सोना-जागना तो लगा हुआ है,
कभी पूरी नींद सोकर तो देखो।
शीतल छूअन तो सबको सुखद है,
कभी अंगोर को टोकर तो देखो।
किसे क्या करना चाहिए का विचार छोड़,
कभी कोई जिम्मेदारी ओढकर तो देखो।
बढती फैलती नफरत के इस दौर में,
प्रेम के धागे में स्वयं को पोकर तो देखो।
भले लोगों की कमी नहीं जमाने में,
इन्सानियत का बीज बोकर तो देखो।
सारा गम गफलत हो जाएगा दिल का,
कभी जीभर रो कर तो देखो।
आपा-धापी में क्या सूरत बना रखे हो,
कभी बिना सपने के सोकर तो देखो।
बहुत कुछ किया सर्वानन्द के लिए,
जो सुकर्म बाकी हैं वो करके तो देखो।
अच्छे से अच्छा साथ सुलभ है धरती पर,
जरा अटल,मंजू,का सानिध्य पाकर तो देखो।
श्रीलक्ष्मी गणेश को तो सभी पूजते हैं,
उर में माँ सरस्वती को बसा कर तो देखो।।
रचयिता---- सर्वानन्द पाण्डेय 'अविज्ञात '
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