बुधवार, 17 जून 2015

मेरा जीवन
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बचपन बीता यौवन आया ,
जिम्मेदारी बढ़ती ही गई।
अपने में सिमट कर बैठा था ,
अपनों की चिन्ता छा ही गई ।
कुछ वर्षों तक मेरा बचपन ,
था लाड़ - प्यार में पला मगर,
रह - रह कर कुछ झटके आए ,
कठिनाई की मिल गई डगर ।
पढ़ने में मैंथा सजग नहीं ,
फिर इश्क की रंगत रही चढ़ी ।
गिरते - पड़ते बढ़ता भी गया ,
दुर्भाग्य रही सामने खड़ी ।
बैठे नाहर - सा मैंने तो ,
श्रम किया नहीं कामना रहा ,
मास्टर भी बना नौकरी मिली ,
पढ़ने - लिखने से मन न भरा ।
पत्नी आई परिवार बसा ,
अध्ययन दख अरमान जगा ।
पढ़ने को अब अवकाश नहीं ,
कविता के प्रति सम्मान जगा ।
जब समय, चाह था,अर्थ नहीं ,
पैसा अब है तो समय नहीं ।
तब भी अभाव था ,अब भी है ,
चंचलता मन का गया नहीं ।
वर्षा आने से पूर्व सुखा ,
मन का उद्यान वीरान बना।
पढ़ - लिखकर ऐसा लगता है ,
जीवन ही एक वितान बना ।
अब तो स्वयं ही पछताता ,
मन का गुब्बारा फूट गया ।
अपनी ही करनी के कारण ,
जीवन ही मेरा लूट गया ।
बीवी की ही अब आस लगी ,
अपने मन को भरमाया हूॅं ।
यौवन की मस्ती कम करके ,
पढ़ने पर उसे लगाया हूॅं ।
है दो साल की नौकरी ,
औ खुशामदी का यह आलम ।
जब चाहो तो अवकाश नहीं ,
झूठा भरना है हर कालम ।
अब ईश्वर से ही निवेदन है ,
रोटी की अन्य व्यवस्था दो ।
इस तीन - पाॅंच से पिण्ड छुटे ,
कर पाक तू शेष अवस्था को ।
--- रचयिता -- सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात ' ।

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