सोमवार, 15 जून 2015

आकर्षण
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मनभावन के प्रति खिंचाव ही , आकर्षण कहलाता है ।
प्रसनन्ता के कारण के , मन पीछे दौड़ा जाता है ।।
समय परिस्थिति देशकाल नित, इसे प्रभावित करते हैं ।
ज्ञान ध्यान संस्कार नीति तो, इसे नियंत्रित करते हैं ।।
नियमों और वर्जनाओं का , शासन मन पर होता है ।
दुखी कभी यह खुश हो जाता , ग्रहण भाव जस होता है ।।
सरल सहज सुख त्वरित रूप में ,काम्य सभी को होता है ।
अनायास आनन्द सुलभ तो , कोई उसे न खोता है ।।
सुख से आकर्षण को हम , आचरण विरोधी अपनाते ।
हैं प्रेम द्वेष दोनों करते , कर हिंसा दया भी दिखलाते ।।
हैं क्षमाशील और क्रोधी भी , सज्जन बनकर के भी छलते ।
होकर कृपालु क्षति भी करते , धन पद मद में पल- पल जलते ।।
पर स्थाई सुख पाने को , यह मन व्याकुल हो जाता है ।
भोग्य वस्तुओं वैभव से तो ,यह अशान्त हो जाता है ।।
इन्द्रियासक्त भटका मन तब ,सादगी प्रिय बन जाता है ।
आखिर में तो विनय शान्ति ही , आकर्षण रह पाता है ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय, ' अविज्ञात '

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