गुरुवार, 18 जून 2015

आज की कविता नहीं यह
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पाप पर ना पुण्य की जय ,
आज भी सब कह रहे यह ,
नहीं असुरों का पराजय ,
आजकी कविता नहीं यह ।‍
मर रहे बहुकाल से ये ,
पर बढ़ेआश्चर्य है यह ,
आसुरी भय त्रास बढ़ते ,
आज की कविता नहीं यह ।
रक्त बीजों से पटे हैं ,
नदी कानन और भू यह ,
एक मरता आठ आते ,
आज की कविता नहीं यह ।
कल लिया संकल्प हमने
साफ कर देंगे जमीं यह ,
पर ,मनस्वी हाथ कितने ?
आजकी कविता नहीं यह ।
पड़ रहे हैं असुर भारी ,
जी रहे हैं मौज से रह ,
मारना हर साल जारी ,
आज की कविता नहीं यह ।
विजय दशमी हम मनाते
क्रूरता को शान्त से सह
सत्य को नित ही दबाते ,
आज की कविता नहीं यह ।।
--- सर्वानन्द पाण्डेय , " अविज्ञात "

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