उत्साह व्यंजन भर रहे
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आम्र बौर पराग कण से ,गन्ध मोहक मिल रहे ।
पुष्प नाना रंग के हैं , वाटिका में खिल रहे ।
तृप्त होकर भ्रमर दल , मस्ती में गुंजन कर रहे ।
स्त्री पुरुष में मिलन का , उत्साह व्यंजन भर रहे ।।
प्रियतमा तो विरह के , असह्य अग्नि में जल रही ।
आम्र मञ्जरियाॅं निरख , संताप में हैं गल रही ।।
मित्र नर की खोज में , कोयल चुहल है कर रही ।
गुलाब के नव पुष्पदल से , गुदगुदी है बढ़रही ।।
मस्त मलय बयार मन की ,,चैन को है छिन रही ।
हाय ! परदेसी पिया की , दूरियाॅं अब खल रही ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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आम्र बौर पराग कण से ,गन्ध मोहक मिल रहे ।
पुष्प नाना रंग के हैं , वाटिका में खिल रहे ।
तृप्त होकर भ्रमर दल , मस्ती में गुंजन कर रहे ।
स्त्री पुरुष में मिलन का , उत्साह व्यंजन भर रहे ।।
प्रियतमा तो विरह के , असह्य अग्नि में जल रही ।
आम्र मञ्जरियाॅं निरख , संताप में हैं गल रही ।।
मित्र नर की खोज में , कोयल चुहल है कर रही ।
गुलाब के नव पुष्पदल से , गुदगुदी है बढ़रही ।।
मस्त मलय बयार मन की ,,चैन को है छिन रही ।
हाय ! परदेसी पिया की , दूरियाॅं अब खल रही ।।
रचयिता --- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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