हमारे व्यक्तिगत , सामाजिक ,ऱाष्ट्रीय और वैश्विक उत्कर्ष के लिए प्रेमालाप की जगह क्या आपसी भाईचारा औरसद्भाव - सहयोग के प्रचार प्रसार सम्न्धी गद्य अथवा काव्य अधिक उपयोगी नहीं रहेंगे ? हमारे हर दूसरे शब्द प्रेमाख्यानक ही क्यों ? इससे किस प्रकार उन्नति हो रही है? बेशक श्रम , संघर्ष और व्यस्तता बढ़ी है किन्तु परवान चढ़ता प्रेमालाप क्या कहीं से हमें कमजोर नहीं कर रहा है ?
प्रेम परोसा मत करो , कुत्ते के मुॅंह अंग ।
जब तक चाटे प्रेम है , काटे तो बदरंग ।।
केलि किसी से मत करो , हेलि मेलि सविलास।
तनुजा भगिनी मातृवत , रख आचरण लिबास ।।
पत्नी - पति के साथ में , हास्य लास्य एकान्त ।
पुत्र पिता भाई समझ , अन्य पुरुष निर्भ्रान्त ।।
नर का मादा से मिलन , है स्वभाव अनुकूल ।
पर पशुवत व्यवहार तो , अनुशासन प्रतिकूल ।।
मानव धर्मी नीतिगत , कानूनी प्रतिकार ।
उत्प्रेरण पर रोक हो , बढ़े न यौन विकार ।।
महक चहक से बहक कर, अनुचित है अनुराग।
निन्दित नग्न शरीर है , विभत्स ,अविराग ।।
कोठों की सब हरकतें ,पति - पत्नी अभिसार ।
आलिंगन चुम्बन खुला , दिखा रही सरकार ।।
उच्छृंखल मतिभ्रष्ट नर , काम पिपासा ध्यान ।
पहिचान न पुत्री बहन का , अन्यों का क्या मान ?
रचयिता --- कविसर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
प्रेम परोसा मत करो , कुत्ते के मुॅंह अंग ।
जब तक चाटे प्रेम है , काटे तो बदरंग ।।
केलि किसी से मत करो , हेलि मेलि सविलास।
तनुजा भगिनी मातृवत , रख आचरण लिबास ।।
पत्नी - पति के साथ में , हास्य लास्य एकान्त ।
पुत्र पिता भाई समझ , अन्य पुरुष निर्भ्रान्त ।।
नर का मादा से मिलन , है स्वभाव अनुकूल ।
पर पशुवत व्यवहार तो , अनुशासन प्रतिकूल ।।
मानव धर्मी नीतिगत , कानूनी प्रतिकार ।
उत्प्रेरण पर रोक हो , बढ़े न यौन विकार ।।
महक चहक से बहक कर, अनुचित है अनुराग।
निन्दित नग्न शरीर है , विभत्स ,अविराग ।।
कोठों की सब हरकतें ,पति - पत्नी अभिसार ।
आलिंगन चुम्बन खुला , दिखा रही सरकार ।।
उच्छृंखल मतिभ्रष्ट नर , काम पिपासा ध्यान ।
पहिचान न पुत्री बहन का , अन्यों का क्या मान ?
रचयिता --- कविसर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
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