प्रकुपित प्रकृति
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प्रकृति और समस्त प्रकृत तत्वों को ,
देवी - देवताओं और परम पिता कोभी ,
निज स्वार्थ में दोहन योग्य मानकर ,
इकोफ्रेंडली स्वभाव को आहतकर ,
अपने और अपनों के त्वरित भोग के लिए ,
स्वार्थान्धी मनुष्य चलाता है ।
पर्यावरण को ही नहीं ,
अपितु पृथवी को भी ,
क्षत विक्षत करके ,
इसके वृक्षों- वनों को काटकर
जलाशयों को घेर और पाटकर ,
पहाड़ों को घनी बस्ती बनाकर ,
अन्तरिक्ष कोभी अधिकाधिक व्यस्तकर ,
और पृथ्वी को हिरोशिमा बनाकर ,
आदमी चलाता है ।
नानाविध प्रदूषण से
प्रकाश संश्लेषण की
अनिवार्यत: जरूरी प्रक्रिया को ,
अनवरत रूप में अवरोधित कर
जीवनाधार भोज्य - पेय पदार्थों को,
अपशिष्ट करके ,
कुपोषण का स्वत: शिकार बन ,
आदमी चलाता है ।
मोबाइल फोन और कम्प्यूटर का
अपने चारों ओरसंजाल बनाकर ,
जानलेवा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र सृजित कर ,
फैक्टरियों के माध्यम से
जल - थल - वायु में कचरे डालकर ,
और परमाणु भट्ठियों से
असाध्य बीमारियों के कारक
रेडियोऐक्टिव अवशिष्ट उत्सर्जित कर
पूरी प्रकृति के हितैषी स्वरूप को
आदमी बिगाड़ता है ।
रेफ्रिजरेटर और एयर कण्डीशनर चलाकर
जहरीली गैसें पैदा करके
ओजोन स्तर को विदी्र्णकर ,
अनावश्यक आग जलाकर
पृथवी का तापमान बढ़ाकरके
ग्लेशियरों को पिघलाकर
और ऋतुचक्र को अव्यवस्थित करके
सूखा , बाढ़ व ठंड का प्रकोप बढ़ाकर
अकाल मृत्यु की ओर
आदमी स्वयं को चलाता है ।
अनियंत्रित रूप में जनसंखया बढ़ाकर ,
आवश्यक खाली जगह को घेरकर ,
निर्विकार शान्त मन में भी
कोलैप्स हो जाने तक
तीब्रतम हलचल पैदाकर ,
अपशब्दों से मनों में ,
कभी भी न बुझने वाली आग लगाकर ,
पृथ्वी के पर्यावरण को
अनेकविध प्रदूषणों से सान्द्रित कर
पूरी पृथ्वी के अस्तित्व को
जलजले की राह पर ,
सर्वाधिक विवेकशील , मतंग मनुष्य
गर्वोन्मत्त होकर चलाता है ।
----- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
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प्रकृति और समस्त प्रकृत तत्वों को ,
देवी - देवताओं और परम पिता कोभी ,
निज स्वार्थ में दोहन योग्य मानकर ,
इकोफ्रेंडली स्वभाव को आहतकर ,
अपने और अपनों के त्वरित भोग के लिए ,
स्वार्थान्धी मनुष्य चलाता है ।
पर्यावरण को ही नहीं ,
अपितु पृथवी को भी ,
क्षत विक्षत करके ,
इसके वृक्षों- वनों को काटकर
जलाशयों को घेर और पाटकर ,
पहाड़ों को घनी बस्ती बनाकर ,
अन्तरिक्ष कोभी अधिकाधिक व्यस्तकर ,
और पृथ्वी को हिरोशिमा बनाकर ,
आदमी चलाता है ।
नानाविध प्रदूषण से
प्रकाश संश्लेषण की
अनिवार्यत: जरूरी प्रक्रिया को ,
अनवरत रूप में अवरोधित कर
जीवनाधार भोज्य - पेय पदार्थों को,
अपशिष्ट करके ,
कुपोषण का स्वत: शिकार बन ,
आदमी चलाता है ।
मोबाइल फोन और कम्प्यूटर का
अपने चारों ओरसंजाल बनाकर ,
जानलेवा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र सृजित कर ,
फैक्टरियों के माध्यम से
जल - थल - वायु में कचरे डालकर ,
और परमाणु भट्ठियों से
असाध्य बीमारियों के कारक
रेडियोऐक्टिव अवशिष्ट उत्सर्जित कर
पूरी प्रकृति के हितैषी स्वरूप को
आदमी बिगाड़ता है ।
रेफ्रिजरेटर और एयर कण्डीशनर चलाकर
जहरीली गैसें पैदा करके
ओजोन स्तर को विदी्र्णकर ,
अनावश्यक आग जलाकर
पृथवी का तापमान बढ़ाकरके
ग्लेशियरों को पिघलाकर
और ऋतुचक्र को अव्यवस्थित करके
सूखा , बाढ़ व ठंड का प्रकोप बढ़ाकर
अकाल मृत्यु की ओर
आदमी स्वयं को चलाता है ।
अनियंत्रित रूप में जनसंखया बढ़ाकर ,
आवश्यक खाली जगह को घेरकर ,
निर्विकार शान्त मन में भी
कोलैप्स हो जाने तक
तीब्रतम हलचल पैदाकर ,
अपशब्दों से मनों में ,
कभी भी न बुझने वाली आग लगाकर ,
पृथ्वी के पर्यावरण को
अनेकविध प्रदूषणों से सान्द्रित कर
पूरी पृथ्वी के अस्तित्व को
जलजले की राह पर ,
सर्वाधिक विवेकशील , मतंग मनुष्य
गर्वोन्मत्त होकर चलाता है ।
----- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , 'अविज्ञात '
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