(अपनी पत्नी जी केअनुरोध पर ' क्या बतलाओगी मुझे त्रास ' स्वरचित कविता के उत्तर स्वरूप रचित अपनी एक कविता
' अभ्यास नहीं एकाकी का ' प्रस्तुत कर रहा हॅं , इस उम्मीद के साथ कि आपको पसंद आए ।
थी आकुलता मुझको भी बड़ी, पल दो पल को मनमीत मिले।
थी आकुलता मुझको भी बड़ी, पल दो पल को मनमीत मिले।
सम हृदयविदग्धा हो सम्मुख, इस व्यथित हृदय को प्रीति मिले।
अवसादित तुम भी पर समर्थ, सुख क्षेम पूछने खुद आई।
रहती थी अंबुद के उर में, बिछुड़ी मोती-सी बिखराई।
हे रूपसि तेरा रूप अमर, मोती-सी विरह में भी सुंदर।
तू प्राणदायिनी गिरकर भी, तुझमें-मुझमें है यह अंतर।
आगमन तेरा मैं धन्य हुई, गुंजित-संगीत एकाकी में।
क्षण को मेरा संताप मिटा, मधु-वन छाया नीरव में।
धन-धाम स्नेह से पूरित हूँ, प्रियजन भी स्वस्थ सुखी सब हैं।
अभ्यास नहीं एकाकी का, प्रिय दूर हुए विरही मन है।
अध्ययन हेतु सेवा से विरत, क्या करूँ यही द्विविधा मन में।
ग्रन्थों को पढ़ती रहती हूँ, पर मन रहता प्रिय चरणों में।
खोली पुस्तक अध्ययन हेतु, है ताप विरह का अंतर में।
प्रिय चिंतन में व्यवधान पड़ें, आँखें नम होतीं तत्क्षण में।
क्या व्यथा कहूँ मैं स्ववश नहीं, मस्तिष्क भी रीता लगता है।
इस हाल में क्या श्रृंगार करूँ, वह धर्म विरुद्ध ही लगता है।
अग्नि को साक्ष्य बना करके,ऐसा ही वचन लिया मैनें।
मन-मंदिर देव नहीं संग में, हूँ शून्य मना, सूनी रैने॥
---- रचयिता-- सर्वानन्द पाण्डेय ' अविज्ञात '
अवसादित तुम भी पर समर्थ, सुख क्षेम पूछने खुद आई।
रहती थी अंबुद के उर में, बिछुड़ी मोती-सी बिखराई।
हे रूपसि तेरा रूप अमर, मोती-सी विरह में भी सुंदर।
तू प्राणदायिनी गिरकर भी, तुझमें-मुझमें है यह अंतर।
आगमन तेरा मैं धन्य हुई, गुंजित-संगीत एकाकी में।
क्षण को मेरा संताप मिटा, मधु-वन छाया नीरव में।
धन-धाम स्नेह से पूरित हूँ, प्रियजन भी स्वस्थ सुखी सब हैं।
अभ्यास नहीं एकाकी का, प्रिय दूर हुए विरही मन है।
अध्ययन हेतु सेवा से विरत, क्या करूँ यही द्विविधा मन में।
ग्रन्थों को पढ़ती रहती हूँ, पर मन रहता प्रिय चरणों में।
खोली पुस्तक अध्ययन हेतु, है ताप विरह का अंतर में।
प्रिय चिंतन में व्यवधान पड़ें, आँखें नम होतीं तत्क्षण में।
क्या व्यथा कहूँ मैं स्ववश नहीं, मस्तिष्क भी रीता लगता है।
इस हाल में क्या श्रृंगार करूँ, वह धर्म विरुद्ध ही लगता है।
अग्नि को साक्ष्य बना करके,ऐसा ही वचन लिया मैनें।
मन-मंदिर देव नहीं संग में, हूँ शून्य मना, सूनी रैने॥
---- रचयिता-- सर्वानन्द पाण्डेय ' अविज्ञात '
Bahut Khoob
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