मेरा परिचय
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नाम--- सर्वानन्द पाण्डेय , उुपनाम ---- कवि अविज्ञाात । जन्म तिथि ---1 -8 - 1956 ,,जन्म स्थान --- बहुता चक उुपाध्याय ,बेल्थरारोड , बलिया ।माता स्व राजमती देवी , पिता -- आचार्य पंडित नरसिंह पाण्डेय ।शिक्षा --- एम एस- सी ( प्राणिविज्ञान ) ।दो भाई और दो बहनें , पत्नी --- डाॅ श्रीमती उषा पाण्डेय ,प्रिंसिपल , श्री राम करण स्नातकोत्त्तर महाविद्यालय ,बलिया ।मैं स्वयं पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी मंडल में मुख्यनियंत्रक के पद पर कार्यरत । रेल कर्मचारियों के सर्विस मामलों में बचाव सलाहकार के कार्य मे सिद्धहस्त।अन्यविभागों के कर्मचारियों / अधिकारियों को भी कानूनी सहायता प्रदान करने में अभिरुचि ।पाॅंच नवम्बर उन्नीस सौ चौरासी से बिना काव्यज्ञान के कविता सृजन में लगा हूॅं ।प्रथम रचना '' श्री किशोरी अ्भििनन्दिनी ' खण्डकाव्य से लगायत अबतक लगभग बारह काव्यग्रन्थों की रचना के क्रम में भर्तृहरिशतक के तीनों खण्डों का काव्यानुवाद भी कर चुका हूॅं ।फेसबुक पर " सर्वानन्दम् परमानन्दम् " मेरा अपना पब्लिक ग्रूप है औरमेरा टाइम लाइन है --- सर्वानन्द पाण्डेय, अविज्ञात ।
मैं मानवधर्म को मानते हुुए सभी धर्मों का समभाव आदर करता हूॅं ।किसी भीी धर्म का अनादर या निन्दा मुझे पसन्द नही क्योकि इससे आपसी सौौहार्द्र में कमी आती है जबकि जीना सभी को साथ है । मैं प्रेम की जगह भााईचाराा को ततरजीह देता हूॅंं । मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिस करने वालों को मैं महामूर्ख समझता हूॅं । सरलता और सहजता मुुझे वरेण्य है ।ओवर ऐक्टिंंग करने वालों से मुझे एलर्जी है ।
गेयता के आधार पर मैं कविता लिखता हूॅं। वाक्यं रससात्मकम् काव्यम् को मनते हुए मैंने चार छन्दमुक्त काव्यग्रन्थों का भी प्रणयन किया है ।बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में खड़ी बोली हिन्दी की दशा पर एक ग्रन्थ मेें मैंनेे लिखा है ------ गतिशून्य पवन ,, थी निशा शाान्त,वसुधा सोई , सागर प्रशान्त ।हिन्दी माॅं के सब रत्न रहे , माॅं की गोदी में पड़े क्लान्त ।सब क्लान्त श्रान्त मदहोश बने , यों धूमिल था अस्मिता ज्ञान ।पुनि मद को ही वे आकुल थे , भारतेन्दु कराए अमृत पाान । जिन नवोदितो को मेरे जैसा अत्यल्प ज्ञान हो उनके उत्सााहवर्थन के लिए उपरोक्त उदाहरण मैंने प्रस्तुत किया है ।
छन्दमुक्त कविता का एक नमूना देखेंं ----- है होना कृतज्ञ / होकर समान उुन्हींं के / जो जीए तो दूसरोंं के लिए / औऱ मरे नहींं मरकर भी / आज तक / छोड़कर ढेरसारे अनुभव अपने / नेमतोंं के रूप मेें ।
आपका ही ---- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात
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नाम--- सर्वानन्द पाण्डेय , उुपनाम ---- कवि अविज्ञाात । जन्म तिथि ---1 -8 - 1956 ,,जन्म स्थान --- बहुता चक उुपाध्याय ,बेल्थरारोड , बलिया ।माता स्व राजमती देवी , पिता -- आचार्य पंडित नरसिंह पाण्डेय ।शिक्षा --- एम एस- सी ( प्राणिविज्ञान ) ।दो भाई और दो बहनें , पत्नी --- डाॅ श्रीमती उषा पाण्डेय ,प्रिंसिपल , श्री राम करण स्नातकोत्त्तर महाविद्यालय ,बलिया ।मैं स्वयं पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी मंडल में मुख्यनियंत्रक के पद पर कार्यरत । रेल कर्मचारियों के सर्विस मामलों में बचाव सलाहकार के कार्य मे सिद्धहस्त।अन्यविभागों के कर्मचारियों / अधिकारियों को भी कानूनी सहायता प्रदान करने में अभिरुचि ।पाॅंच नवम्बर उन्नीस सौ चौरासी से बिना काव्यज्ञान के कविता सृजन में लगा हूॅं ।प्रथम रचना '' श्री किशोरी अ्भििनन्दिनी ' खण्डकाव्य से लगायत अबतक लगभग बारह काव्यग्रन्थों की रचना के क्रम में भर्तृहरिशतक के तीनों खण्डों का काव्यानुवाद भी कर चुका हूॅं ।फेसबुक पर " सर्वानन्दम् परमानन्दम् " मेरा अपना पब्लिक ग्रूप है औरमेरा टाइम लाइन है --- सर्वानन्द पाण्डेय, अविज्ञात ।
मैं मानवधर्म को मानते हुुए सभी धर्मों का समभाव आदर करता हूॅं ।किसी भीी धर्म का अनादर या निन्दा मुझे पसन्द नही क्योकि इससे आपसी सौौहार्द्र में कमी आती है जबकि जीना सभी को साथ है । मैं प्रेम की जगह भााईचाराा को ततरजीह देता हूॅंं । मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिस करने वालों को मैं महामूर्ख समझता हूॅं । सरलता और सहजता मुुझे वरेण्य है ।ओवर ऐक्टिंंग करने वालों से मुझे एलर्जी है ।
गेयता के आधार पर मैं कविता लिखता हूॅं। वाक्यं रससात्मकम् काव्यम् को मनते हुए मैंने चार छन्दमुक्त काव्यग्रन्थों का भी प्रणयन किया है ।बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में खड़ी बोली हिन्दी की दशा पर एक ग्रन्थ मेें मैंनेे लिखा है ------ गतिशून्य पवन ,, थी निशा शाान्त,वसुधा सोई , सागर प्रशान्त ।हिन्दी माॅं के सब रत्न रहे , माॅं की गोदी में पड़े क्लान्त ।सब क्लान्त श्रान्त मदहोश बने , यों धूमिल था अस्मिता ज्ञान ।पुनि मद को ही वे आकुल थे , भारतेन्दु कराए अमृत पाान । जिन नवोदितो को मेरे जैसा अत्यल्प ज्ञान हो उनके उत्सााहवर्थन के लिए उपरोक्त उदाहरण मैंने प्रस्तुत किया है ।
छन्दमुक्त कविता का एक नमूना देखेंं ----- है होना कृतज्ञ / होकर समान उुन्हींं के / जो जीए तो दूसरोंं के लिए / औऱ मरे नहींं मरकर भी / आज तक / छोड़कर ढेरसारे अनुभव अपने / नेमतोंं के रूप मेें ।
आपका ही ---- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , अविज्ञात
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