रविवार, 31 जनवरी 2016

जागता भी नहीं और सोता नहीं 

इस बस्ती में मन ना लगे , जाने क्यूॅं ,
हाल मेरी बनी है अजब देखिए ।
कामनाओं पर अकुश लगाया नहीं ,
हार पर हार मेरी गजब देखिए ।।
आॅंख से अश्रु अब तो निकलते नहीं ,
हॅंस के ऐसा रोया , कोई रोता नहीं ।
हाल ऐसी बनी मेरी तनहाई का ,
जागता भी नहीं और सोता नहीं ।।
है समझ ही नहीं मुझे औचित्य का ,
सीख फिर भी किसी की नहीं मानता ।
जाने अनजाने आए किसी कार्य को ,
कह सकता नहीं कि नहीं जानता ।
चाहता हूॅं सुधरना अभी से सही ,
कोई भी तो बता दे , मैं कैसे रहूॅं ।
उम्र के शेष लमहें कटें ठीक से ,
देख बर्बादी बच्चों की कैसे सहूॅं ??
--- कवि सर्वानन्द पाण्डेय , ' अविज्ञात '
मुख्य नियंत्रक , पूर्वोत्तर रेलवे , वाराणसी ।

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